शिमला, 1 मार्च (आईएएनएस)। हिमाचल प्रदेश में न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव के हालात बन रहे हैं। इसका कारण उच्च न्यायालय का वह आदेश है जिसमें राजधानी की बंद की गई सड़कों पर विधायकों के वाहनों को चलाने और पार्क करने पर रोक लगा दी गई है।
इस मुद्दे पर एकजुटता की दुर्लभ मिसाल पेश करते हुए मंगलवार को विधानसभा ने उच्च न्यायालय के इस फैसले की कटु आलोचना की। सदस्यों ने दलगत भावना से ऊपर उठते हुए न्यायपालिका को जवाबदेह बनने का आह्वान करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश संविधान से ऊपर नहीं हैं और मनमाने फैसले नहीं ले सकते।
यह विवाद तब शुरू हुआ था जब पिछले साल नवंबर में उच्च न्यायालय ने शिमला में बंद एवं प्रतिबंधित सड़कों पर जाने के लिए राज्य सरकार द्वारा वाहनों के परमिट जारी करने पर रोक लगा दी थी।
मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने सदन को आश्वस्त करते हुए कहा, “सरकार विधायकों के सम्मान से समझौता नहीं करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि उनकी मर्यादा बरकरार रहे। ”
उन्होंने कहा कि नया मेट्रोपोल के पास की सड़क और माल रोड स्थित विधायकों के आवास का इस्तेमाल विधायकों के वाहनों की पार्किं ग के लिए किया जाएगा।
विधानसभा अध्यक्ष बी.बी.एल. बुटैल ने इस झमेले के लिए गृह विभाग को जिम्मेदार ठहराया क्योंकि उसने उच्च न्यायालय के आदेश का गलत अर्थ निकाला। उच्च न्यायालय के आदेश के बाद बुटैल के वाहन पर भी दंड लगा था।
इस मुद्दे को विधानसभा में भाजपा सदस्य हंस राज ने प्रश्नकाल के दौरान उठाया था।
कांग्रेस सदस्य संजय रतन ने कहा कि न्यायपालिका, विधायिका को चुनौती दे रही है। यह सही नहीं है।
उन्होंने कहा, “लोकतंत्र में निर्वाचित सदस्यों को इस तरह से अपमानित नहीं किया जाना चाहिए।”
मुख्यमंत्री ने कहा कि वह भी इस मुद्दे को लेकर चिंतित हैं।
उन्होंने कहा, ” विधानसभा एक संवैधानिक संस्था है और विधायकों की अपनी मर्यादा है। इसकी हर कीमत पर रक्षा होनी चाहिए। विधायकों के अधिकारों और विशेषाधिकारों की रक्षा होनी चाहिए।”
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