श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश), 23 मई (आईएएनएस)। भारत ने स्वदेशी तकनीक से निर्मित पुन: उपयोग में लाए जा सकने वाले प्रक्षेपण यान (आरएलवी) का सोमवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र से सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया।
श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश), 23 मई (आईएएनएस)। भारत ने स्वदेशी तकनीक से निर्मित पुन: उपयोग में लाए जा सकने वाले प्रक्षेपण यान (आरएलवी) का सोमवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र से सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के निदेशक देवी प्रसाद कार्णिक ने आईएएनएस को बताया, “हमने आरएलवी-टीडी मिशन को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। इसे यहां से सुबह सात बजे प्रक्षेपित किया गया।”
यह मिनी अंतरिक्ष यान पृथ्वी से लगभग 70 किलोमीटर ऊपर 10 मिनट की उड़ान के बाद वापस श्रीहरिकोटा से लगभग 450 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी में निर्धारित स्थान के पास सहजता के साथ उतरा।
इस 1.7 टन वजनी आरएलवी को आंध्र प्रदेश में इसरो के अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया गया।
इस मिशन के सफल होने के बाद भारत, अमेरिका, रूस, फ्रांस और जापान जैसे देशों की कतार में खड़ा हो गया है, जिनके पास आरएलवी अंतरिक्ष यान हैं।
गौरतलब है कि इस उड़ान परीक्षण के लिए बूस्टर के साथ सात मीटर लंबे रॉकेट का इस्तेमाल किया गया, जिसका वजन 17 टन था।
इस मिशन से इसरो हाइपरसोनिक गति, स्वायत्त लैंडिंग के डेटा संग्रहित करने में सक्षम हो गया है।
विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) के निदेशक के.सिवन ने आईएएनएस को बताया, “इस मिशन का दीर्घकालिक उद्देश्य फिर से इस्तेमाल किए जा सकने वाले प्रक्षेपण यान के जरिए लांच पर आने वाली लागत को 80 प्रतिशत तक घटाना है।”
अंतरिक्ष एजेंसियां पृथ्वी की कक्षाओं में उपग्रहों को स्थापित करने के लिए मध्यम से भारी वजन के रॉकेटों के निर्माण और इस्तेमाल पर प्रति किलोग्राम 20,000 डॉलर तक खर्च करती हैं।
सिवन ने बताया, “आगामी परीक्षण उड़ानों में हम दोबारा प्रयोग किए जानेवाले यान को जमीन पर किसी निश्चित स्थान पर उतारने की कोशिश करेंगे। यह उसी तरीके से होगा, जिस प्रकार से विमान रनवे पर उतरता है, ताकि हम उपग्रह छोड़ने के लिए इसका दोबारा इस्तेमाल कर सकें।”
इस आरएलवी प्रौद्योगिकी को करीब 100 करोड़ रुपये (1.40 करोड़ डॉलर) की लागत से विकसित किया गया है।
सिवन ने आगे कहा, “इस जटिल प्रौद्योगिकी को विकसित करने और दोबारा उपयोग किए जा सकने वाले यान के निर्माण में एक दशक से ज्यादा का समय लगा है और इसे हमने अपने संसाधनों से बनाने में कामयाबी हासिल की है।”
अंतरिक्ष एजेंसी ने परीक्षण किए गए यान से पहले दो और आरएलवी प्रोटोटाइप का निर्माण किया था, जिनमें दूसरे फीचर्स थे और वे अंतिम यान से छह गुणा बड़े थे।
अमेरिकी अरबपति इलोन मस्क की स्पेस एक्स और अमेजन के मालिक जेफ बेजोस की ब्लू ओरिजिन ने हाल ही में इसी प्रकार के परीक्षण किए हैं।
स्पेस एक्स ने फाल्कन 9 रॉकेट का परीक्षण दिसंबर में किया, जबकि ब्लू ओरिजिन ने अप्रैल में न्यू सेपार्ड का तीसरा परीक्षण पूरा किया।
नासा ने हालांकि 2011 में इस प्रकार के रॉकेट के कार्यक्रम को रोक दिया था। इससे पहले नासा पिछले तीन दशकों से डिस्कवरी, एंडेवर, कोलंबिया और चैलेंजर रॉकेट का इस्तेमाल अंतरिक्ष परिवहन प्रणाली के तौर पर कर रहा था।
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