‘अब आर्थिक परतंत्रता से मुक्ति पाने का समय’

गाजियाबाद, 15 अगस्त (आईएएनएस)। राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद देश को आत्मनिर्भर बनने में 70 साल लग गए। अब हमें आर्थिक स्वतंत्रता के मोर्चे पर काम करने की जरूरत है। यह बात यहां स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर रविवार को आयोजित एक सिंपोजियम में लगभग सर्वसम्मति से उभर कर आई।

15 अगस्त, 1947 को राजनीतिक आजादी मिलने के बाद स्वतंत्र भारत के सामने क्या लक्ष्य थे? उन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हमने क्या किया? और आज 70 साल बाद अपनी स्वतंत्रता को लेकर हमारे सामने क्या चुनौतियां खड़ी हैं?

इन सवालों को लेकर इस सिंपोजियम में समाजविज्ञानियों, वरिष्ट पत्रकारों, शिक्षाविदों और प्रौद्योगिकीविदों ने तीन घंटे तक विचार-विमर्श किया। सिंपोजियम का संयोजन इनोवेटिव इंडियन फाउंडेशन ने किया था। विमर्श का विषय था ‘रिडाफाइनिंग फ्रीडम’। यह आयोजन परमहंस पब्लिक स्कूल के परिसर में हुआ।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से प्रशिक्षित और वैज्ञानिक समाज कार्य के विशेषज्ञ कार्तिकेय शुक्ल ने स्वतंत्रता को पुनर्परिभाषित करते हुए देश के युवाओं के सामने खड़ीं बाधाओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पिछले दो साल में देश में जैसी स्थितियां बनी हैं, उनमें सर्वाधिक चिंता में देश का वह युवा वर्ग है, जो देश की कुल आबादी में बहुसंख्य है।

उन्होंने कहा कि अगर इस वर्ग की आर्थिक स्वतंत्रता जल्द ही सुनिश्चित न की गई तो देश विकट स्थितियों में पहुंच सकता है।

रसायनशास्त्र के विद्वान और राजनीति में सक्रिय डॉ. संजीव शर्मा ने कहा, “हमारी आजादी सबल की आजादी का रूप लेती जा रही है। कमजोर तबके को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आजादी दिलाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।”

वरिष्ट पत्रकार संजय सिंह ने कहा, “राजनीतिक स्वतंत्रता का लक्ष्य खुद को आत्मनिर्भर बनाना था। लेकिन अभी हम स्थिति में नहीं पहुंच पाए हैं कि देश के नागरिकों के बीच संसाधनों के समान वितरण को सुनिश्चित कर पाएं।”

शिक्षाविद पृथ्वीसिंह ने जातिवाद को स्वतंत्रता बोध के लिए सबसे बड़ी बाधा बताया। उन्होंने कहा, “दुनिया के दूसरे देशों के लिए जिस तरह नस्ल और रंग भेद बड़ी समस्याएं रही है, उसी तरह हमारे लिए जातिवाद है।”

समाजवादी चिंतक सत्येंद्र यादव ने देश के ढाई सौ साल के इतिहास को सिलसिलेवार बताते हुए भारतवर्ष की मुख्य समस्या आर्थिक शोषण को ही बताया।

उन्होंने कहा, “आजादी के बाद के पचास साल में लोकतंत्र के विकास को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। हमें देखना पड़ेगा कि आजादी के समय हमारी स्थिति क्या थी। सिर्फ पचास साल के कालखंड में हमने कई क्षेत्रों में आत्तनिर्भरता के लक्ष्य हासिल किए।”

आईआईटी कानपुर से प्रशिक्षित जल विज्ञानी के.के. जैन ने स्वतंत्रता को संसाधनों के समवितरण के नजरिए से देखा। उन्होंने कहा, “देश में उपलब्ध संसाधनों की मात्रा को असीमित मानना बहुत बडी भूल होगी। देश में दिन प्रति दिन घट रही जल उपलब्धता स्वतंत्र भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।” उन्होंने सुझाव दिया कि जनसंख्या नियंत्रण हमारी प्राथमिकता सूची में सबसे उपर होना चाहिए।

सामाजिक उद्यमी मुदित माथुर ने प्रशिक्षित युवा समूह की ओर से रोजगार सृजन की एक नवोन्मेषी परियोजना का खाका पेश किया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक रूप से स्वतंत्र भारत में इस समय युवा वर्ग अपनी आर्थिक स्वतंत्रता का उपाय ढूंढ़ रहा है।

आयोजन के मेजबान नरेद्र चौधरी ने कहा, “बुद्धिजीवी वर्ग को निश्चिंतता के साथ सक्रिय होने का समय आ गया है। विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं के गुणदोष यही वर्ग समझ और समझा सकता है।”

आयोजन का संचालन इनोवेटिव इंडियन फांउडेशन के चेयरमैन सुधीर जैन ने किया। आयोजन की प्रस्तावना में उन्होंने स्वतंत्रता और स्वछंदता के भेद को सामने रखा।

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