नई दिल्ली, 16 अक्टूबर (आईएएनएस)। स्वयंसेवी कार्य समूह ‘कंज्यूमर वॉयस’ ने जीएसटी परिषद् से आग्रह किया है कि वह वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) व्यवस्था के अंतर्गत सभी प्रकार के तंबाकू उत्पादों पर सर्वाधिक 40 प्रतिशत कर लागू करे।
संस्था ने कहा है कि इससे तंबाकू के सेवन एवं लत को कम किया जा सकेगा। विशेषकर गरीब तबके एवं देश के युवाओं के बीच इसके सेवन पर रोक लगाने में मदद मिल सकेगी। इसमें सिगरेट, बीड़ी, धुआं रहित तंबाकू के साथ ही पान मसाला भी शामिल हैं।
संस्था की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि वैश्विक रूप से यह बात साबित हो चुका है कि तंबाकू का सेवन रोकने का सबसे प्रभावी तथा सीधा तरीका है, तंबाकू उत्पादों की कीमत कर के जरिए बढ़ा देना।
संस्था ने कहा है कि साल 2012 में तंबाकू उद्योग के अत्यधिक विरोध के बावजूद, फिलीपींस ने मील का पत्थर साबित करने वाला टोबैको ‘सिन’ कर पारित कर दिया। इससे सिगरेट की बिक्री को 14 प्रतिशत तक कम करने में मदद मिली। हालांकि, तंबाकू कर से प्राप्त होने वाला राजस्व 118 प्रतिशत बढ़ गया।
बयान में कहा गया है कि तंबाकू के सेवन से स्वास्थ्य एवं देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक बोझ पड़ता है। प्रत्येक वर्ष, लगभग 10 लाख भारतीय तंबाकू संबंधी बीमारियों से भारत में मारे जाते हैं। तंबाकू का सेवन करने के कारण होने वाली बीमारी का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष कुल लागत चौंका देने वाला है। वर्ष 2011 में यह 1.04 लाख करोड़ रुपये (17 अरब डॉलर) या जीडीपी का 1.16 प्रतिशत था।
संस्था ने बयान में कहा है कि तंबाकू की चिकित्सा लागत अकेले ही सीधे तौर पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च का 21 प्रतिशत है। वास्तव में तंबाकू की लागत भारतीय सरकार/राज्यों द्वारा तंबाकू से होने वाले आबकारी राजस्व (जो कुल स्वास्थ्य लागत का 17 प्रतिशत है) की तुलना में कहीं अधिक है।
‘कंज्यूमर वॉयस’ के असीम सान्याल के अनुसार, “जीएसटी की इस व्यवस्था को इन हानिकारक चीजों सिगरेट, बीड़ी, पान मसाला, खैनी तथा अन्य को उच्च कर के जरिए कम करना चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा, “जीएसटी के अंतर्गत अन्य सभी तंबाकू की तरह बीड़ी पर समान स्तर का कर लगाना चाहिए, क्योंकि बीड़ी पर जीएसटी की कम दर लागू करने से इसकी चपेट में आने वालों के बीच इसके सेवन को बढ़ावा मिलेगा और वे गरीबी रेखा से नीचे ही बने रहेंगे।”
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