हृदयनारायण दीक्षित
हृदयनारायण दीक्षित
रूप दिखाई पड़ते हैं। सभी प्राणी रूपवान हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट-पतंग, जलचर और वनस्पतियां रूपवान हैं। प्रकृति के सभी रूप देखे जाते हैं। रूपवान प्राणी बोलते भी हैं। वाणी स्वयं को प्रकट करने का ही एक माध्यम है। वाणी दिखाई नहीं पड़ती। रूप दिखाई पड़ते हैं, वाणी सुनी जाती है। वाणी से रूप का भी वर्णन संभव है, कलाकार रूप का चित्रण भी करते हैं।
कभी-कभी कलाकार की प्रतिभा रूप के चित्रण में अद्भुत विशेषता लाती है तब कहा जाता है कि अमुक कलाकार के चित्र बोलते हैं। चित्र रूपों की ही अनुकृति होते हैं। लेकिन चित्र में अंकित रूपों के पास वाणी यंत्र नहीं होता। प्रकृति से सभी प्राणियों को वाक्शक्ति मिली है। सभी प्राणी बोलते हैं, लेकिन उनकी बोली का अर्थ नहीं समझा जा सकता।
मैं बहुधा सोचता हूं कि प्राणी देह से भी बोला करते हैं। वे बिना बोले भी बोलते रहते हैं। तब वाक्यंत्र या वाणी नहीं रूप आकार ही स्वयं को प्रकट करता है। स्वयं को प्रकट करना सभी जीवों की प्रकृति है। हम मौन रहकर भी बिना बोले नहीं रह सकते। मौन की भी अपनी भाषा है। मौन में बिना बोले ही बहुत कुछ कहने की शक्ति भी है। मैं पीछे 10-15 बरस से अपने शरीर की भाषा सुन रहा हूं। देह बोलती है। तमाम संकेत देती है। अपनी व्यथा कथा सुनाती है बहुधा।
पहले भाषा नहीं थी। तमाम आवश्यकताओं के लिए दैहिक संकेत ही माध्यम थे। चार्ल्स डारविन ने प्रेम या काम इच्छा के लिए दैहिक संकेतों के विकास का अनुमान किया है। प्रकृति और उसके अंगो में अंतर्विरोध हैं। पहले तमाम जैविक आवश्यकताओं के लिए दैहिक संकेत ही थे। जान पड़ता है कि नृत्य का विकास भाषा के जन्म से भी पुराना है। नृत्य देह की ही भाषा है। अब भाषा और बोली का अद्भुत विकास हो चुका है तो भी देह भाषा का उपयोग बहुत नहीं घटा।
सुस्पष्ट बातचीत करने वाले लोग भी बीच-बीच में हाथ उठाते हैं, राजनेता मंच पर तमाम दैहिक भाव प्रकट करते हैं। वाक्यशक्ति असीम नहीं है। भाषा से सूचना देना आसान है लेकिन भाव प्रकट करने के लिए देह का सहयोग लेना ही पड़ता है।
कवि जगन्नाथ रत्नाकर ने उद्धव और गोपियों की वार्ता का सजीव वर्णन किया है, “नेकु कही बेननि सों/अनेकु कही नैननिसों/रही सोऊ कहि दीन्ही हिचकीन सों” प्रेमरस डूबी गोपियों ने उद्धव से वार्ता में थोड़ा कुछ बोली से कहा, उससे ज्यादा आंखों से और शेष प्रेमभाव हिचकियों से प्रकट किया। मनुष्येतर प्राणी संभवत: अपने समाज में देहभाषा का प्रयोग कुछ ज्यादा ही करते ही होंगे।
देहभाषा के संकेत ग्रहण करना कठिन नहीं। हम अपने परिजनों और निंदकों की देहभाषा आसानी से समझते हैं। लेकिन अपनी ‘देहभाषा’ पर प्राय: ध्यान नहीं देते। स्वयं को प्रकट करते समय हमारे हाथ उंगली आदि भिन्न-भिन्न मुद्राओं में उठते हैं। बोलने या भाषण की कला सिखाने वाले पेशेवर गुरु इसकी बारीकियां समझाते हैं। इस कला पर तमाम मजेदार पुस्तकें भी हैं। लेकिन यह सब देहभाषा को प्रकट करने की पेशेवर तकनीक ही है।
मेरी ²ष्टि में इसका उपयोग सीमित है। स्वयं को दूसरों के लिए प्रकट करने का प्रशिक्षण संभव है। दूसरे की देहभाषा के संकेत समझना भी कठिन नहीं है, लेकिन असली बात दूसरी है। क्या हम अपनी देह भाषा के संकेत स्वयं के लिए भी ग्रहण करते हैं? हमारी देह हमसे भी बाते करती है। मन में विचारों का मेला रहता है। तमाम विकल्प होते हैं। मन प्रतिपल सक्रिय रहता है। मन व्यस्त रखता है। ऐसे में हम अपनी देह के ही संदेशांे की उपेक्षा करते हैं। देह भी हमसे प्रतिपल वार्तारत रहती है। हम देह के संकेत सुने तो बड़े मजेदार अनुभव होंगे।
सभी प्राणियों को भूख लगती है। यह देह की ही पुकार है। हम सब इस मांग को समझते हैं। देह के भीतर आया कोई विकार पीड़ा में प्रकट होता है। देह दर्द हमारे लिए विकार की सूचना है। ज्वर या देहताप की वृद्धि भी देहभाषा का ही व्याकरण है लेकिन देह प्रसन्नता या संतोष भी व्यक्त करती है।
हम मन प्रसन्नता को ग्रहण करते हैं, देह प्रसन्नता का उत्सव नहीं मनाते। मन प्रसन्नता की तरंगे देह पर भी प्रकट होती हैं। इसका उल्टा भी होता है। देह प्रसन्नता की तरंगे मन तक जाती हैं और देह के कारण मन भी प्रसन्न हो जाता है। योग सूत्रों में इसी सूक्ष्म ज्ञान का प्रयोग किया गया है। देह की विभिन्न मुद्राओं से चित्तवृत्ति के निरोध तक जाना ही योग का प्रथम चरण है।
देह हमारा वास्तविक घर है। कंक्रीट सीमेंट के घर प्राणवान नहीं होते। सो बुढ़ाते नहीं। देह बुढ़ाती है। मन नहीं बुढ़ाता। जीर्ण हो रही देह हमको बार-बार सजग करती है- हमारा समय पूरा होने को है, हम टूट रहे हैं, उठो, जागो, जागरण से बोध लो। समय कम है।
पूर्वजों ने देह को वीणा भी बताया है। वीणा के तारों की तरह देह भी जटिल संश्लिष्ट संरचना है। हर एक तार में संचार की अपनी क्षमता है और अपनी संगीत क्षमता। वीणा का संगीत समग्र उपकरण की एकात्मकता का मधुरस है। हमारी देह का भी संगीत ऐसा ही है। देह विरोध भी करती है। तंबाकू खाते ही थूकने के लिए विवश करती है।
देह का संदेश है कि हम तंबाकू बर्दास्त नहीं कर सकते। हमने शराब पीने वालों को विचित्र मुंह बनाते देखा है। देह विरोध करती है कि दारू पीना स्वाभाविक नहीं। राह चलते कोई कीट पतंग चेहरे से टकराता है, देह प्रतिरोध करती है, कीट मुंह में घुस गया है तो देह कई बार थूकने को विवश करती है। पुराणकारों ने देह को धर्म साधना का साधन कहा है। उपनिषद् के ऋषियों ने देह के सभी अंगों के पुष्ट रहने की स्तुतियां की हैं।
देह हमारी जीवनयात्रा का अभिन्न भाग है। मैं नहीं जानता कि भूत-प्रेत होते हैं कि नहीं होते। लेकिन सुना है कि उनके देह नहीं होती, सो बहुत व्यथा में रहते हैं। देह दर्शन जीवन का यथार्थ है। सांसारिक भोगों के लिए स्वस्थ देह जरूरी है, लेकिन योग, ध्यान, तप और मोक्ष के लिए भी देह चाहिए।
देहभाषा को अब बॉडी लैंगवेज कहा जा रहा है। इस पर भी किताबें हैं, लेकिन स्वयं की देहभाषा और पुकार पर ध्यानाकर्षण का काम केवल भारत में हुआ है। मैं जीवन के उत्तरार्ध में हूं।
जान पड़ता है कि उत्तरार्ध में देह ज्यादा बातें करती है। अकेले में तो और भी ज्यादा। हम जैसे ही एकांत में होते हैं, देह अपना रोना शुरू कर देती है। अपनी कठिनाई, अपनी पीड़ा, अपना इतिहास और अपनी ही व्यथा कथा। एक तरफा बोलती है, हमारी कोई बात नहीं सुनती। उसे हमारी महत्वाकांक्षा या पदलिप्सा और यशलिप्सा से क्या लेना देना? उसकी अपनी व्यथा है हमारी अपनी अतृप्त इच्छाओं का संसार बड़ा है।
मैं देह का वक्तापन और स्वयं के श्रोतापन का भोक्ता हूं। सुनता रहता हूं, अपनी देह की बातें, लेकिन उसकी समस्याओं के निदान के लिए जरूरी श्रम नहीं करता। मन संकल्प से कमजोर हूं। सुना है कि राजा जनक विदेह थे। कैसे हुए होंगे विदेह? नहीं जानता। श्रीकृष्ण ने गीता मंे बताया है कि योग तप से। योग तप के लिए भी देह की ही आवश्यकता होती है। (आईएएनएस/आईपीएन)
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
dharmpath.com dharmpath