भोपाल, 13 नवंबर (आईएएनएस)। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तीन दिवसीय लोक-मंथन के दूसरे दिन रविवार को ‘नव-उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में राष्ट्रीयता’ विषय पर आयोजित सामूहिक सत्र में भारत की अवधारणा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ को उदारीकरण बताया।
मुख्यमंत्री चौहान ने कहा कि भारत की माटी और संस्कृति में उदारीकरण और भूमंडलीकरण है। राष्ट्रीयता और उदारीकरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही है।
चौहान ने आगे कहा कि भारत में हजारों वर्ष पहले ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की बात कही गई है। यह उदारीकरण ही है। भारत में हमेशा विचारों की स्वतंत्रता रही है। पश्चिम में राजतंत्र के बाद स्वतंत्रता और समानता के उद्देश्य को लेकर प्रजातंत्र का जन्म हुआ। औद्योगिक क्रांति के बाद शोषण के विरुद्ध सर्वहारा के लिए साम्यवाद का जन्म हुआ। साम्यवाद और इसके बाद पूंजीवाद में भी मनुष्य का सुख संभव नहीं हो पाया।
उन्होंने कहा कि मनुष्य केवल व्यक्ति नहीं, समाज भी है। इसलिए समाज के सुख पर भी विचार करना होगा। भारतीय दर्शन का मूल है कि एक ही चेतना सर्वव्याप्त है। प्रकृति का शोषण नहीं, बल्कि दोहन करना चाहिए। विश्व को यही सनातन विचार राह दिखा सकता है।
शिवराज ने कहा कि जीवन में अर्थ का अभाव नहीं होना चाहिए और अर्थ का प्रभाव भी नहीं होना चाहिए। उन्होंने केंद्र सरकार के निर्णय का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करके अर्थ का प्रभाव समाप्त कर दिया है। इस निर्णय से कालाधन, फर्जी मुद्रा और आतंकवाद की फंडिंग खत्म हो जाएगी।
इस मौके पर नीति आयोग के सदस्य डॉ. विवेक देबोराय ने राष्ट्रीयता के परिपेक्ष्य में स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा, “भारत की जनता मोक्ष पर विश्वास करती है। सत चित आनंद में विश्वास करती है। यदि मुझे भारत पर गर्व नहीं है तो इसका अर्थ है कि मुझे स्वयं पर भी गर्व नहीं है। ग्लोबलाइजेशन के नाम पर हमारी हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति पर खतरा मंडरा रहा है। हम अपनी संस्कृति और परंपरा को भी नहीं जानते। हमारे पैंतीस हजार शास्त्रों में से उन्नीस हजार का अनुवाद भी नहीं हुआ है।”
‘वसुधैव कुटुंबकम’ का अर्थ है, पूरी दुनिया रिश्तेदार। जब समूची दुनिया हमारी कुटुंब है तो देश में धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव क्यों है और गुजरात के दंगों में हजार इंसानों और उत्तर प्रदेश के अखलाक को मौत की नींद कैसे सुला दिया जाता है, रोहित वेमुला को क्यों आत्महत्या करनी पड़ती है, यह आम जनता की समझ से परे है।
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