भोपाल, 14 नवंबर (आईएएनएस)। फिल्म निर्माता और लेखक विवेक अग्निहोत्री ने यहां सोमवार को कहा कि भारतीय सिनेमा में 90 के दशक तक नायक के रूप में आम आदमी की छवि दिखाई देती थी, लेकिन अब यह ‘आम आदमी’ सिनेमा से गायब हो गया है। वास्तविकता पर आधारित फिल्में अब नहीं बनती हैं।
मध्यप्रदेश की राजधानी स्थित विधानसभा परिसर में चल रहे तीन दिवसीय ‘लोक-मंथन’ के तीसरे दिन ‘भारतीय फिल्मों का बदलता परिदृश्य’ विषय पर आयोजित समानांतर सत्र में अग्निहोत्री ने कहा, “विदेशी मीडिया ने जीसस पर अब तक 1400 छोटी-बड़ी फिल्में बनाई हैं। हमारे देश के फिल्म निर्माताओं ने गुरु नानक, गौतम बुद्ध, महावीर और गांधी जैसे महापुरुषों को सिनेमा से दूर रखा।”
अग्निहोत्री ने आगे कहा कि फिल्मों के बदलते परिदृश्य को समझने के पहले फिल्म निर्माताओं में आए बदलाव को देखा जाना चाहिए। पहले फिल्म निर्माता और नायक-नायिकाएं देश के संकट के समय लोगों की मदद के लिए स्वयं आगे आते थे। लेकिन आज ऐसी स्थिति बन गई है कि उरी हमले के बाद फिल्म निर्माताओं को यह कहने में एक महीना लग जाता है कि वह देश से प्यार करते हैं।
उन्होंने कहा कि फिल्मों ने हमेशा वंचित वर्ग और शोषक के बीच की लड़ाई को चित्रित किया है, जिसमें नायक हिंदुस्तान का आम आदमी है। इस समय बन रही फिल्मों में आम आदमी का चेहरा नजर नहीं आता।
राज्यसभा सदस्य रूपा गांगुली ने काले धन पर केंद्र सरकार के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे फिल्म उद्योग पर अवश्य ही फर्क पड़ेगा, लेकिन देशहित में यह आवश्यक है। इस निर्णय से देश 10 साल आगे चला गया है। इस निर्णय के बाद लोग 10, 20 और 50 रुपये के नोट की इज्जत करने लगे हैं।
दक्षिण भारतीय फिल्मों के निर्माता टी.एस. नागर्भण ने कहा, “फिल्मों में पिछले एक दशक में नई तरीके की राष्ट्रीयता देखने में आई है। पहले आजादी से जुड़े आंदोलन पर आधारित देश-प्रेम की फिल्में बनाई जाती थीं। आज ‘चक दे इंडिया’, ‘लगान’ और ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसी फिल्में बनाई जा रही हैं।”
सत्र की अध्यक्षता करते हुए फिल्म निर्माता मधुर भंडारकर ने कहा कि उन्होंने वास्तविकता पर आधारित फिल्में बनाईं। आगे वह अपातकाल पर ‘इंदू सरकार’ नाम से फिल्म बना रहे हैं। उन्होंने 9/11 और 26/11 की घटनाओं का उदहारण देते हुए कहा कि कई बार वास्तविक जीवन में ऐसी घटनाएं होती हैं, जो कभी फिल्मों में नहीं देखी गईं।
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