नई दिल्ली, 21 जनवरी (आईएएनएस)। तमिलनाडु सरकार ने शनिवार को जल्लीकट्टू को इजाजत देने वाला अध्यादेश जारी कर दिया, लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि अध्यादेश की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य सरकार ने अपने अधिकार का उपयोग कर अध्यादेश तो जारी कर दिया है, लेकिन यदि यह अध्यादेश सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करने वाला होता है तो इसे रोका जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने सात मई, 2014 को दिए अपने फैसले में कहा था कि पशु क्रूरता रोकथाम अधिनियम-1960 के तहत बैल या सांड को मिले अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता, और जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा दिया था।
हालांकि तमिलनाडु में पोंगल के अवसर पर सांड और मनुष्य के बीच दमखम के इस पारंपरिक खेल जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध के खिलाफ शुरू हुए व्यापक धरना-प्रदर्शन को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक सप्ताह के लिए अपने फैसले को वापस लेने पर असहमति जता दी थी।
विशेषज्ञों ने आईएएनएस को बताया कि राज्य सरकार द्वारा जारी अध्यादेश संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल कर पारित किया गया और आपात स्थिति में इसे जारी किया जा सकता है।
लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप ने कहा कि राज्य सरकार को जल्लीकट्टू को इजाजत देने के लिए अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल कर अध्यादेश जारी करने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि चाहे कोई मामला न्यायालय के समक्ष विचाराधीन क्यों न हो, संवैधानिक शक्तियां खत्म नहीं होतीं।
एक अन्य विशेषज्ञ और लोकसभा के महासचिव रह चुके पी. डी. टी. अचारी ने बताया कि इस अध्यादेश के कारण सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन मामला प्रभावित होगा।
अचारी ने बताया, “सर्वोच्च न्यायालय ने पशु क्रूरता रोकथाम अधिनियम के तहत जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगाया। अगर विधानमंडल ने अधिनियम में ही संशोधन कर प्रदर्शनकारी पशुओं की सूची से बैल और सांड को बाहर कर दिया गया है, तो इससे पहले का कानून स्वत: ही निष्प्रभावी हो जाता है।”
विशेषज्ञों ने हालांकि यह भी कहा कि अगर किसी ने केंद्रीय कानून का उल्लंघन करने वाला कहकर इसे चुनौती दी तो सर्वोच्च न्यायालय अध्यादेश की वैधता की जांच जरूर कर सकता है।
कश्यप ने कहा, “अध्यादेश न्यायिक समीक्षा के दायरे में होता है। अदालत यह तय करेगी कि यह अध्यादेश संवैधानिक शक्तियों से बाहर जा कर पारित किया गया, या संवैधानिक शक्तियों की सीमा में रहकर।”
वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने बताया कि किसी अध्यादेश को कोई भी चुनौती दे सकता है।
ग्रोवर ने बताया, “यह निर्भर करता है कि अध्यादेश किस तरह का है। अगर अध्यादेश बिना आधार में बदलाव किए अदालत के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए जारी किया गया है तो यह असंवैधानिक होगा।”
dharmpath.com dharmpath