चंडीगढ़, 6 अप्रैल (आईएएनएस)। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की इस घोषणा के बाद कि वह भविष्य में चुनाव नहीं लड़ेंगे, पिछले महीने ही एक दशक बाद राज्य की सत्ता में लौटी कांग्रेस को दो महत्वपूर्ण मामलों पर गहन विचार-विमर्श करना होगा।
चंडीगढ़, 6 अप्रैल (आईएएनएस)। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की इस घोषणा के बाद कि वह भविष्य में चुनाव नहीं लड़ेंगे, पिछले महीने ही एक दशक बाद राज्य की सत्ता में लौटी कांग्रेस को दो महत्वपूर्ण मामलों पर गहन विचार-विमर्श करना होगा।
अमरिंदर जहां मुख्यमंत्री के रूप में अपनी दूसरी पारी संभाल रहे हैं, कांग्रेस को केवल अपने चुनावी वादे निभाने और नई सरकार के प्रदर्शन के बारे में ही नहीं सोचना होगा, बल्कि किसी ऐसे योग्य नेता को भी तैयार करना होगा जो 2022 के विधानसभा चुनाव को इसी माद्दे के साथ संभाल सके कि पार्टी को फिर जीत हासिल हो।
अमरिंदर के नए मंत्रिमंडल में शायद राजनीतिक रूप से सबसे बड़े और कद्दावार नेताओं में क्रिकेटर से नेता बने नवजोत सिंह सिद्धू और वित्तमंत्री मनप्रीत सिंह बादल का नाम सबसे ऊपर है। लगभग 50 की उम्र के दोनों नेताओं में काफी समानताएं भी हैं।
पंजाब में बेहद लोकप्रिय सिद्धू को जहां राष्ट्रीय स्तर के ‘सेलेब्रिटी’ का दर्जा प्राप्त है, वहीं उनकी साफ-सुथरी छवि है, बेहद ऊर्जावान हैं और अच्छे वक्ता भी हैं, जो भीड़ जुटा सकते हैं।
इतना ही नहीं, वह पंजाब के मुख्य राजनीतिक समुदाय ‘जाट सिख’ से हैं और युवाओं में भी लोकप्रिय हैं।
वहीं, पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री रह चुके प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत भी जाट सिख हैं, जिनके नाम में ‘बादल’ जुड़ा है और कुछ वर्गो में उनकी अच्छी पैठ है।
अपने चाचा और चचेरे भाई सुखबीर सिंह बादल से 2010 में अलग हुए मनप्रीत ने एक नई राजनीतिक पार्टी ‘पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब’ (पीपीपी) का गठन करके अपनी राजनीतिक राह अलग कर ली थी। लेकिन मनप्रीत और पीपीपी दोनों को ही 2012 विधानसभा चुनाव में मुंह की खानी पड़ी थी। इसके बाद पिछले साल वह कांग्रेस में शामिल हो गए थे।
लेकिन कांग्रेस खेमे में सिद्धू और कांग्रेस दोनों का एक बड़ा नकारात्मक पक्ष भी है। दोनों कांग्रेस में ‘बाहरी’ हैं, जिनमें से सिद्धू केवल कुछ महीने पहले और मनप्रीत एक साल से थोड़ा पहले ही पार्टी का हिस्सा बने थे।
कांग्रेस के लिए राज्य में अपने नेतृत्व को नजरअंदाज करके इन ‘बाहरी’ नेताओं को चुनने का फैसला आसान नहीं होगा।
पार्टी ने हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में 177 में से 77 सीटें जीती थीं। वहीं उसके कुछ दिग्गजों को हार का भी सामना करना पड़ा था, जबकि कुछ अन्य चुनाव मैदान में उतरे ही नहीं।
कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक पूर्व मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्टल चुनाव हार गईं। इसी तरह सुनील जाखड़ को भी हार का सामना करना पड़ा। वहीं, एक अन्य वरिष्ठ नेता लाल सिंह ने अपने बेटे के लिए जगह बनाने के लिए इस बार चुनाव न लड़ने का फैसला किया था।
अमरिंदर के अलावा कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में से किसी में भी समूचे पंजाब की जनता को लुभाने और पार्टी को एक और जीत दिलाने का माद्दा नहीं है।
सिद्धू में हालांकि इस मामले में कुछ दम-खम नजर आता है, जिसके बाद दूसरे नंबर पर मनप्रीत बादल का नाम है।
अब कांग्रेस को यह मुश्किल फैसला सोच-समझकर लेना होगा कि वह राज्य में पार्टी की कमान सौंपने के लिए नई पीढ़ी के नेताओं में से किसी को चुने या फिर पार्टी के पुराने नेताओं में से किसी को, जिन्होंने चुनावी परिदृश्य में कई राज्यों में भाजपा के प्रभुत्व से अलग पंजाब में पार्टी के लिए उम्मीद की किरण दिखाई है।
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