फसल बीमा योजना से राज्यों पर दबाव

नई दिल्ली, 24 मई (आईएएनएस)। किसानों के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी फसल बीमा योजना (प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना) ने राज्यों पर दबाव डाला है, जबकि शुरुआत के बाद से लेकर अब तक एक साल की अवधि में यह बीमा कवरेज का विस्तार 50 फीसदी तक करने में सफल हुआ है।

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि कुछ राज्यों की शिकायत है कि उनके कृषि क्षेत्र के बजट आवंटन की आधी धनराशि बीमा कंपनियों को प्रीमियम अदा करने में ही खत्म हो गई, जिसके कारण खजाने तथा मौजूदा बुनियादी ढांचों पर दबाव पड़ रहा है।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीआई) जनवरी 2016 में शुरू की गई थी, जिसके तहत किसानों को खरीफ फसलों के कुल बीमे का दो फीसदी, रबी फसलों का 1.5 फीसदी तथा बागवानी व वाणिज्यिक फसलों के लिए 5 फीसदी रकम का भुगतान करना होता है, जबकि बाकी रकम का भुगतान केंद्र व राज्य सरकार मिलकर आधा-आधा करती हैं।

अधिकारी ने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर कहा, “पिछले साल, देश के लगभग 20 फीसदी किसानों ने फसल बीमा लिया। हालांकि पीएमएफबीआई ने कवरेज बढ़ाकर 30 फीसदी तक कर दिया। इस साल केंद्र सरकार ने 13,500 करोड़ रुपये की रकम का भुगतान किया। चूंकि राज्यों को भी बराबर रकम यानी 50 फीसदी भुगतान करना होता है, इसलिए उन्हें कृषि कोष का अधिकांश धन पीएमएफबीवाई के तहत प्रीमियम के लिए देना पड़ा।”

फसल बीमा कवरेज के मामले में पिछले साल तक भारत दुनिया में आठवें पायदान पर था, जबकि पीएमएफवाई के बाद देश तीसरे स्थान पर पहुंच गया।

अधिकारी ने कहा, “क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट आजादी के बाद से ही होता आ रहा है, लेकिन किसी ने इसमें सिर नहीं खपाया कि यह किया कैसे जाता है। यह वास्तव में होता है या केवल कागज पर किया जाता है, स्पष्ट नहीं था। नई फसल बीमा योजना के शुरू होने के बाद कई लोग क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट के लिए सामने आए।”

फसल बीमा के दायरे का विस्तार हुआ, लेकिन राज्यों में कर्मचारियों व मशीनरी की संख्या में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई, जिसके कारण राजस्व विभाग दबाव में आ गया।

महाराष्ट्र के कृषि विभाग के एक अधिकारी ने कहा, “हम समस्याओं से जूझ रहे हैं, क्योंकि मौजूदा वक्त में राजस्व कर्मचारी दबाव में हैं। हालांकि हमें उम्मीद है कि आगामी कुछ वर्षो में हम बुनियादी ढांचों की व्यवस्था करने में सक्षम होंगे। पीएमबीएफवाई बेहतर प्रदर्शन कर सकता है, अगर इसका क्रियान्वयन प्रभावी तथा पारदर्शी तरीके से किया जाए।”

कृषि मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, योजना को अपनाने वाले किसानों की संख्या पिछले साल पांच फीसदी थी, जो इस साल बढ़कर 25 फीसदी हो गई। ये वैसे किसान हैं, जिन्होंने ऋण नहीं ले रखा है।

निजी कंपनियों को शामिल करने के कारण योजना की आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने हालांकि अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि सरकार के पास उतनी धनराशि, बुनियादी ढांचा तथा बीमा समर्थन नहीं है, जितने की जरूरत है, जबकि निजी कंपनियां योजना को दक्षता लाती है और पारदर्शिता के लिए अनुकूल माहौल प्रदान करती हैं।

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