पटना, 7 दिसंबर (आईएएनएस)। जाने-माने कवि और लेखक अरुण कमल का कहना है कि हिंदी समाज पूरे हिंदी भाषी क्षेत्रों को मिलाकर बना है। इसे किसी राज्य की सीमा में बांधना उचित नहीं है। उनका कहना है कि बांग्ला, मराठी भाषी क्षेत्रों में साहित्य और साहित्यकारों के प्रति लोगों के मन में प्रेम और श्रद्धा होती है, लेकिन हिंदी भाषी क्षेत्रों में इसका अभाव है।
पटना, 7 दिसंबर (आईएएनएस)। जाने-माने कवि और लेखक अरुण कमल का कहना है कि हिंदी समाज पूरे हिंदी भाषी क्षेत्रों को मिलाकर बना है। इसे किसी राज्य की सीमा में बांधना उचित नहीं है। उनका कहना है कि बांग्ला, मराठी भाषी क्षेत्रों में साहित्य और साहित्यकारों के प्रति लोगों के मन में प्रेम और श्रद्धा होती है, लेकिन हिंदी भाषी क्षेत्रों में इसका अभाव है।
पटना पुस्तक मेले में शिरकत कर रहे अरुण मानते हैं कि इसके पीछे एक बड़ा कारण ‘धन की महिमा’ या सामंती विचारधारा है।
आईएएनएस के साथ विशेष बातचीत में उन्होंने हिंदी भाषी क्षेत्रों में उदाहरण के तौर पर कहा कि यहां की सामंती विचारधारा का ही परिणाम है कि यहां कूड़ा दूसरे के दरवाजे के सामने फेंकसकते हैं या फिर सिनेमाघरों में यत्र-तत्र गंदगी फैलाते हैं। उनका कहना है कि ऐसे लोगों के मन में साहित्य के प्रति श्रद्धा हो ही नहीं सकती।
काव्य-संग्रह ‘नए इलाके में’ के लिए वर्ष 1998 का ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ प्राप्त अरुण के व्यक्तित्व निर्माण के मुख्य प्रेरणास्रोत उनके पिता कपिलदेव मुनि रहे। प्रारंभ से ही कविता लेखन में अरुण कमल की विशेष रुचि थी। कविता की भावुकता उनके निजी जीवन में भी देखने को मिलती है। संगीत में भी उनकी विशेष अभिरुचि है।
बिहार के रोहतास जिले में जन्मे और पले-बढ़े तथा अपनी कविताओं में जीवन के विविध क्षेत्रों का चित्रण करने वाले अरुण कहते हैं, “इस विविधता के कारण उनकी भाषा में भी विविधता के दर्शन होते हैं। मैं अपनी कविताओं में लोकजीवन से शब्दों, मुहावरों, ग्रामीण बोली-भाषा व स्थानीय शब्दों का ही अधिकांश प्रयोग करता हूं।”
स्त्री और पुरुष साहित्यकारों में अंतर के विषय में पूछे जाने पर उन्होंने आईएएनएस को कहा कि दोनों में कोई अंतर नहीं है। दोनों की दृष्टि जरूर अलग होती है। किसी विषय पर जिस पर स्त्रियों की जानकारी अधिक होती है, उस पर वे ज्यादा लिख सकती हैं, लेकिन अंतर कोई नहीं होता।
अरुण कहते हैं, “साहित्यकारों का रूप उभयलिंगी या अर्धनारीश्वर का होता है। स्त्री व पुरुष के बिना किसी दुनिया की कल्पना नहीं हो सकती। यही स्थिति साहित्य की दुनिया में भी है।”
प्रगतिशील चिंतन के कवि माने जाने वाले अरुण का कहना है, “किसी भी लेखक या साहित्यकार का संघर्ष पुरस्कार से और उसके प्रति नहीं होता।”
हालांकि, उन्होंने इसमें यह भी जोड़ा कि वह छद्म लेखकों की बात नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि लेखकों या साहित्यकारों की इच्छा यही रहती है कि उनके काव्यों और रचनाओं को अधिक से अधिक लोग पढें़ और उनके जाने (मृत्यु) के बाद भी उनकी रचनाओं के जरिए उन्हें याद किया जाए।
अपनी कविताओं में समकालीन राजनीति के चित्रण के साथ-साथ समसामयिक परिवेश की छाप छोड़ने वाले अरुण की झोली में साहित्य अकादमी के अलावा कई पुरस्कार आ चुके हैं। अरुण ने कविता लेखन के अलावा कई पुस्तकों और रचनाओं का अनुवाद भी किया है। इनकी कविता जितनी आपबीती होती है, उतनी ही जगबीती भी होती है, यही कारण है कि पाठक इनकी कविताओं को पसंद करते हैं।
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