प्रिनी (हिमाचल प्रदेश)-हिमाचल प्रदेश की मनोरम वादियों में बसे इस गांव के लोग आज भी भारतीय राजनीति के कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी को याद करते हैं। वाजपेयी ने बीमारी से पहले राजनीति के कोलाहल से दूर इस गांव में कुछ वक्त बिताने के लिए यहां एक छोटा-सा घर बनवाया था।
मनाली-नग्गर मार्ग से लगे गांव में ब्यास नदी के किनारे उनकी कुटिया आज भी मौजूद है। मनाली रिसॉर्ट के बाहरी इलाके में प्रिनी स्थित है। वाजपेयी अंतिम बार इस गांव में स्थित घर में जून 2006 में आए थे।
उसके बाद से इस घर में कोई नहीं आया। गांव वाले उन दिनों को बेहद चाव से याद करते हैं, जब वाजपेयी प्रधानमंत्री होते हुए यहां हर वर्ष गर्मी के मौसम में आते थे और गांव के लोगों के साथ कुछ वक्त बिताते थे।
गांव के निवासी तुले राम ने आईएएनएस से कहा, “हमारे लिए वह भगवान हैं। अपने पड़ोसियों के प्रति उनका रवैया बेहद नरम था और गांव के विकास के लिए तत्पर रहते थे।”
मई 2011 में उनकी यात्रा को याद करते हुए एक ग्रामीण 55 वर्षीय राम ने कहा कि स्थानीय लोगों के आग्रह पर वाजपेयी ने यहां तत्काल एक पुल का निर्माण तथा गांव को मनाली से जोड़नेवाली सड़क बनाने का भी निर्देश दिया था।
उस वक्त वाजपेयी ने संवाददाताओं से कहा था कि प्रिनी के 2001 के दौरे के दौरान उन्होंने अपनी ‘ऊंचाई’ नामक कविता की रचना की थी। उन्होंने उस कविता के मुखड़े भी सुनाए थे।
इसी गांव के निवासी मेहर ठाकुर वाजपेयी के पुराने मित्र ताशी दावा को याद करते हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री को रोहतांग सुरंग बनाने के लिए राजी किया था।
लाहौल निवासी दावा उर्फ अर्जुन गोपाल का दिसंबर 2007 में निधन हो गया।
ठाकुर ने कहा, “वे (वाजपेयी और दावा) बेहद अच्छे मित्र थे। जब भी वाजपेयी प्रिनी आते थे, दावा को बुलाना नहीं भूलते थे। वे घंटों आपस में विचारों का आदान-प्रदान करते थे।”
उन्होंने कहा, “जब वाजपेयी पहली बार 1998 में प्रधानमंत्री बने थे, तो दावा ने लाहौल घाटी के लोगों के एक प्रतिनिधिमंडल को साथ लेकर प्रधानमंत्री से दिल्ली में मुलाकात की थी।”
भाजपा नेता तथा दो बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे प्रेम कुमार धूमल ने आईएएनएस से कहा, “राज्य के लोग वाजपेयी के ऋणी हैं। राज्य के किसी भी अनुरोध को उन्होंने कभी नहीं ठुकराया और वह वित्तीय मदद देने में भी काफी उदारता बरतते थे।”
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