इंदौर- इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से हुई मौतों के मामले ने अब संवैधानिक और प्रशासनिक गंभीरता का रूप ले लिया है। इस प्रकरण की सुनवाई मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में चल रही है जहां अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि इस घटना ने देश के सबसे स्वच्छ शहर की छवि को गहरा आघात पहुंचाया है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पीने का पानी ही सुरक्षित नहीं है तो यह सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह समस्या केवल भागीरथपुरा तक सीमित नहीं दिखती बल्कि पूरे इंदौर शहर की जल-आपूर्ति प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। इसी आधार पर कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले में राज्य के मुख्य सचिव को सुनना चाहते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि मामला व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से जुड़ा है।
अब तक दूषित पानी पीने से 17 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। अस्पतालों में कुल 421 मरीज भर्ती कराए जा चुके हैं जिनमें से 311 को इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई है। फिलहाल 110 मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं जबकि 15 मरीजों की हालत गंभीर बनी हुई है और वे आईसीयू में हैं। इसके अलावा उल्टी-दस्त के 38 नए मामले सामने आए हैं जिनमें से 6 मरीजों को अरबिंदो हॉस्पिटल रेफर किया गया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रभावित इलाकों में अब भी जो पानी सप्लाई किया जा रहा है वह पीने योग्य नहीं है। इस संदर्भ में यह भी याद दिलाया गया कि 31 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम को नागरिकों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के स्पष्ट निर्देश दिए थे। इसके बावजूद दायर की गई स्टेटस रिपोर्ट से संतोषजनक परिणाम सामने नहीं आए।
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