नई दिल्ली, 11 मई (आईएएनएस)। डिजाइनर अनुराधा रमम मानती हैं कि भारतीय हथकरघा उद्योग हजारों कारीगरों की आजीविका के अलावा संस्कृति और भावनाओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए हथकरघा को संरक्षित रखे जाने की जरूरत है।
नई दिल्ली, 11 मई (आईएएनएस)। डिजाइनर अनुराधा रमम मानती हैं कि भारतीय हथकरघा उद्योग हजारों कारीगरों की आजीविका के अलावा संस्कृति और भावनाओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए हथकरघा को संरक्षित रखे जाने की जरूरत है।
अनुराधा हथकरघा संरक्षण विधेयक में बदलाव के खिलाफ हैं। इस विधेयक ने 1985 से लेकर अबतक हथकरघा बुनकरों को मशीन निर्मित कपड़ों और पॉवरलूम प्रतिस्पर्धियों से सुरक्षा प्रदान की है।
अनुराधा ने आईएएनएस को बताया, “मेरी व्यक्तिगत रूप से यह राय नहीं है कि हथकरघा उद्योग को बुनकरों से दूर किया जा रहा है। ये बुनकर अपनी अगली पीढ़ी तक इस कौशल को पहुंचा रहे हैं और विश्व भर में भारत को अपने हथकरघा उद्योग की वजह से ही जाना जाता है।”
उन्होंने कहा, “हथकरघा विधेयक, 1985 में संशोधन के लिए चल रही चर्चा से स्थिति अधिक बिगड़ी है। इससे हथकरघा की यूएसपी खत्म हो जाएगी।”
ऐसा अनुमान है कि सरकार की हथकरघा संरक्षण अधिनियम में संशोधन की योजना है। यह खबर पॉवरलूम लॉबी द्वारा हथकरघा उद्योग को समान अवसर देने के प्रयासों के बाद आई है। पॉवरलूम लॉबी ने सरकार से इस अधिनियम में संशोधन करने का आह्वान किया है।
अनुराधा का मानना है, “यदि इस विधेयक में संशोधन होता है तो बुनकर समुदाय की आय का स्रोत समाप्त हो जाएगा और इस कला का अंत हो जाएगा।” अनुराधा स्वयं आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल के 350 से अधिक बुनकरों को सहयोग करती हैं।
अनुराधा के मुताबिक, “यह पॉवरलूम क्षेत्र की योजना है। पॉवरलूम क्षेत्र फैब्रिक्स उत्पादन के 60 प्रतिशत पर अधिकार रखता है और अब वह हथकरघा क्षेत्र को पॉवरलूम क्षेत्र में तब्दील कर पूरे बाजार पर नियंत्रण स्थापित करना चाहता है।”
उन्होंने कहा, “पॉवरलूम क्षेत्र हथकरघा को एक अप्रचलित और अप्रासंगिक क्षेत्र के रूप में देखता है, जिसका कोई आर्थिक मूल्य नहीं है। मैं यही कहूंगी कि यह पॉवरलूम क्षेत्र के लोगों की व्यापार रणनीति है कि वह परंपरागत हथकरघा क्षेत्र को नजरअंदाज कर पावरलूम के जरिए अधिक पैसा कमाना चाहती है और इसलिए वे सरकार पर दबाव बना रहे हैं।”
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