नेपाल भूकंप : पीड़ित आजीविका को लेकर भयभीत

रामकोट (नेपाल), 22 मई (आईएएनएस)। नेपाल में 25 अप्रैल को आए विनाशकारी भूकंप के बाद काठमांडू के एक गांव में रहने वाले 23 वर्षीय शैलेंद्र लामा भूकंप की मार से तो बच गए हैं, लेकिन उनकी आजीविका का एकमात्र स्रोत इस त्रासदी में समाप्त हो गया है।

रामकोट (नेपाल), 22 मई (आईएएनएस)। नेपाल में 25 अप्रैल को आए विनाशकारी भूकंप के बाद काठमांडू के एक गांव में रहने वाले 23 वर्षीय शैलेंद्र लामा भूकंप की मार से तो बच गए हैं, लेकिन उनकी आजीविका का एकमात्र स्रोत इस त्रासदी में समाप्त हो गया है।

इस भूकंप में शैलेंद्र लामा (डेयरी किसान) की चारों गाएं मारी गई हैं। काठमांडू से 20 किलोमीटर दूर इस गांव में अपने घर के सामने मलबे के ढेर पर बैठे लामा काफी उदास हैं और इसी गांव की स्थानीय निवासी बरखा जोशी कहती हैं कि अब इसके लिए अपने परिवार को पालना बहुत मुश्किल है। क्योंकि खेती के उसके सभी जानवर मर चुके हैं।

शैलेंद्र और बरखा अकेले इस त्रासदी से पीड़ित नहीं हैं। हजारों की संख्या में डेयरी किसान दोबार अपना व्यवसाय शुरू करने में असमर्थ है। क्योंकि भूकंप में उनके पशु मारे जा चुके हैं।

नेपाल की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि आधारित आजीविका पर निर्भर है और पशु पालन उनकी आजीविका का एकमात्र स्रोत है।

नेपाल के पशुधन सेवा विभाग के आंकड़े बताते हैं कि नेपाल में भूकंप की वजह से 100,000 घरेलू पशुओं की मौत हो गई है, जिनमें गाय, भैंस और बकरी शामिल हैं।

लेकिन स्वयंसेवी संगठन ह्यूमन सोसायटी इंटरनेशनल के अनुमान के मुताबिक, इस भूकंप में 60 से 90 लाख गाय, बकरियां और अन्य पशु मारे गए हैं। हजारों कुत्तों और बिल्लियों को भी देखरेख की जरूरत है।

एनिमल वेलफेयर नेटवर्क ऑफ नेपाल (एडब्लूएनएन) के अध्यक्ष मनोज गौतम ने आईएएनएस को बताया, “अभी भी मलबे में दबे शवों का निस्तारण बहुत बड़ी चुनौती है।”

भूकंप से जीवित बच गए पशुओं को मनोवैज्ञानिक आघात पहुंचा है।

नेपाल के जेन गुडऑल इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक गौतम ने कहा, “बड़ी संख्या में पशु संक्रमित घावों से जूझ रहे हैं। रीढ़ की हड्डी में चोट सामान्य है लेकिन इस तरह के मामलों में हम अधिक कुछ नहीं कर सकते। यहां तक कि फ्रैक्चर भी काफी गंभीर है।”

आवास की कमी की वजह से चीर-फाड़ और निमोनिया जैसी श्वास संबंधी बीमारियां सामान्य हैं।

उन्होंने कहा, “हमारी प्राथमिकता इस तरह के जानवरों का इलाज करना है। लेकिन शवों के निस्तारण की कमी की वजह से महामारी फैल सकती है।”

एडब्लूएन दल आठ प्रभावित जिलों के गांवों में पहुंच गए हैं। इस दल में पशु चिकित्सक और स्वयंसेवी भी शामिल हैं।

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