जंगली जड़ी-बूटियों से दवा निर्माण की इकाई लगाएगा छत्तीसगढ़

blister-berriesरायपुर, 9 जून (आईएएनएस/वीएनएस)। छत्तीसगढ़ की डॉ. रमन सिंह सरकार अब प्रदेश में बड़ी मात्रा में पाई जाने वाली लाभदायक जड़ी-बूटियों से आयुर्वेदिक और हर्बल दवाइयों का निर्माण करने वाली इकाई लगाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। पहले चरण में रायपुर और सरगुजा में दवा निर्माण इकाई स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। बस्तर में पाए जाने वाले जंगली कंदमूल से सौंदर्य उत्पाद, बेबीफूड, केप्सूल का खोल और साबूदाना बनाया जा रहा है। वहीं बस्तर में ही मिलने वाले तिखूर का तो विदेशों में भी निर्यात हो रहा है।

छत्तीसगढ़ वैसे भी विभिन्न तरह के चिकित्सीय और सुगंधित पेड़-पौधों से समृद्ध है। इसमें से ज्यादातर जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल पीढ़ियों से आयुर्वेद, यूनानी और हर्बल दवाओं के रूप में किया जाता है। कैंसर से निपटने ब्रम्हामार, श्वांस संबंधी समस्याओं के लिए सतावर, सफेद मूसली, काली मुसली, अस्वगंध टानीक, कुकराडा और अदूसा, मधुमेह (ब्लड सुगर) से निपटने गुड़मार, सदासुहागन, याददाश्त बढ़ाने के लिए ब्राम्ही और वाच जैसी जड़ी-बूटियां प्रदेश के जंगल में उपलब्ध हैं।

आदिवासी कई तरह की जड़ी-बूटियों का उपयोग स्वयं को स्वस्थ रखने करते हैं जिसमें राई जैसे दाने वाले मोटे अनाज को रागी कहते हैं। मधुमेह से पीड़ित लोगों के लिए यह भोजन और औषधि दोनों का काम करती है। इसी तरह बस्तर में भल्लातक यानी भिलवा नामक सुंदर फल पाया जाता है। यह काजू से छोटा होता है। इसका तेल दाहत है तो बीज की गिरी रासायन कर्म करती है।

जेरेटिक इफेक्ट को नियमित करने के लिए यह औषधि का काम करती है। इसके अलावा बस्तर में बस्तर बीयर के नाम से चर्चित सल्फी से भी कई बीमारियों का इलाज होता है।

ज्ञात हो कि बस्तर से जिमीकंद सहित कुछ और कंद देश के दूसरे प्रदेशों में ले जाए जाते हैं और उनसे केप्सूल के खोल बनाए जाते हैं। चूंकि जिमीकंद में स्टार्च अधिक होता है। साथ ही वह घुलनशील भी होता है। वहीं बस्तर में पाया जाने वाला सिमलीकंद भी एक विशेष कंद होता है इसे खरीदकर गुजरात के व्यापारी साबूदाना बनाते हैं।

मुख्यमंत्री रमन सिंह की यह इच्छा है कि कंदमूल से दवाइयां बनाई जाए उससे जंगल में रहने वाले ग्रामीणों को लाभ तो होगा ही, साथ ही उद्योग स्थापित होने पर लोगों को रोजगार भी मिल सकेगा। साथ ही प्रदेशवासियों को अच्छे स्वास्थ्य के लिए अच्छी दवाइयां भी सस्ते में सुलभ हो सकेगी। साथ ही छत्तीसगढ़ में निर्मित दवाइयों से पूरे देश में लोगों को स्वस्थ रखने में भी मदद मिलेगी।

लघु वनोपज महासंघ के प्रबंध निदेशक बीएल शरण ने बताया कि प्रदेश में आयुर्वेद और हर्बल दवा निर्माण की स्थापना के लिए निविदा आमंत्रित की गई है। फिलहाल राज्य में चरोटा पाउडर संयंत्र की स्थापना के लिए प्रयास किया जा रहा है। चरोटा बीजों से निकलने वाले पाउडर का इस्तेमाल गम और लुब्रीकेंट के निर्माण में किया जा सकेगा। इसके बीजों का इस्तेमाल कॉफी को स्वादिष्ट बनाने में भी किया जा सकेगा।

वहीं रायपुर में भी एक दवा निर्माण इकाई की स्थापना पर विचार किया जा रहा है। उनकी माने तो छत्तीसगढ़ में ब्लड कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी के उपचार में लाभदायक जड़ी बूटियां भी मिलती हैं।

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