दिल्ली – राजनीति संयोग,साजिश लीक और “सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट “का खेल है। इसमें “जो इतिहास भूलता है,वह उसे दोहराने का अभिशाप भोगता है” की बात चलती है। राजनीति में जब अपनों की नापसंदगी के बावजूद कोई उभरता है तो उसे विपक्ष से अधिक उसे अपने दोस्तों से अधिक “खतरा” होता है। लीक अपने ही करते हैं।
संयोग है कि सुषमा स्वराज से जुड़े लीक हुए सारे पर्सनेल ई-मेल उसी जांच का हिस्सा है जिसका रिकार्ड खुद सरकार के सबसे रसूख वाले मंत्री के पास है। संयोग है कि एक साल पूरा होने पर सभी सर्वे और लोगों की नजर में जब सुषमा स्वराज स्वाभाविक रूप से सबसे बेहतर मंत्री के रूप में सामने आयी तो लीक-खेल शुरू हो गया। संयोग है कि जब ललित मोदी लंदन से क्रिकेट घोटाले में नरेन्द्र मोदी के सबसे करीबी और पॉवरफुल मंत्री के खिलाफ मोर्चा खोलते हैं, जिसे खुद बीजेपी के अंदर एक सेक्शन का पूरा सपोर्ट खुलकर मिला हुआ है, तब ऐसा लीेक होता है जिससे एक तीर,दो शिकार मारा जाता है।
हैरानी की बात है कि ऐसा उस सरकार में हो रहा है जिसका मुखिया खुद ऐसे लीक का शिकार होता रहा है और हर लीक के बाद वह और मजबूत बनकर उभरता था। इतिहास से उन्हें सबक लेने की जरूरत है। इतिहास गवाह है कि अपनों के लीक का शिकार बाद में मजबूत और लीक करने वाला कमजोर होता है।
साथ ही यूपीए से भी सीख लेने की जरूरत है। शुरू के 6 साल मनमोहन सरकार के खूब शानदार चले। फिर तभी सरकार के अंदर पी चिदंबरम और प्रणव मुखर्जी का इगो और इंटरेस्ट आपस में टकराया। इसके बाद साजिश और लीक का खेल ऐसा चला कि सरकार का हर चिट्ठा “सेल फॉर लीक” के टैग के साथ टंगने लगा। इसका असर और कांग्रेस की इससे दुर्गति चुनाव में देखने को मिली एेसे में नई सरकार में साल भर अंदर अगर मंत्रियों के बीच खेमेबाजी-लीक खेल पब्लिक होने लगे तो यहां भी उसे इतिहास से सबक लेने की जरूरत है।
साभार – नरेंद्र नाथ
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