चिकित्सा शिक्षण द्विभाषीय माध्यम में होने की उठी मांग

भोपाल, 12 सितम्बर (आईएएनएस)। चिकित्सा शिक्षण कार्य हिंदी में न होने पर विशेषज्ञ चिंतित हैं, उनका मत है कि चिकित्सा शिक्षण द्विभाषीय माध्यम में हो। विशेषज्ञों ने यह राय मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में विज्ञान के क्षेत्र में हिंदी विषय पर आयोजित सत्र में रखी।

इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए शनिवार को केन्द्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि ‘विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी’ सत्र का मुख्य उद्देश्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा एवं अभियांत्रिकी विषयों में पाठ्यक्रम सामग्री का हिन्दी में विकास एवं हिन्दी में विज्ञान को लोकप्रिय बनाना तथा विज्ञान संचार को प्रोत्साहन देना है।

उन्होंने कहा कि विज्ञान के महत्वपूर्ण विकास के लिए इसकी उपलब्धि जन-मानस तक पहुंचाना जरूरी है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘जय जवान-जय किसान’ के साथ ‘जय विज्ञान’ को जोड़ा था। डॉ. हर्षवर्धन ने विज्ञान में हिंदी भाषा के उपयोग को और प्रभावी बनाने के लिए सोशल मीडिया पर हिंदी में विज्ञान सामग्री की उपलब्धता तथा विज्ञान पर केन्द्रित दैनिक समाचार-पत्र के प्रकाशन जैसे विषय पर भी चर्चा की।

चर्चा में विद्वानों द्वारा इस बात पर जोर दिया गया कि विज्ञान में हिन्दी के विकास के लिए चिकित्सा क्षेत्र की नियामक संस्थाओं द्वारा एक निश्चित समय-सीमा में सभी चिकित्सा परीक्षाओं में हिन्दी भाषा में लिखने की छूट हो तथा चिकित्सा शिक्षण द्विभाषीय माध्यम से हो।

सत्र के अंतिम दिन शनिवार को लगभग 16 अनुशंसाएं प्रस्तुत की गई। दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के पिछले दो दिवसीय सत्रों में देश के विख्यात वैज्ञानिक एवं विज्ञान संचारकों ने अपने विचार रखते हुए हिन्दी में विज्ञान की उपलब्धता के संबंध में चुनौतियों और अवसरों पर विस्तृत चर्चा की।

दोनों सत्र में डा. शिवगोपाल मिश्र, डा. एन.के. सहगल, डा. मोहनलाल छीपा, डा. बी.के. सिन्हा, पूर्व वैज्ञानिक, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग तथा डा. सुभाष लखेड़ा पूर्व वैज्ञानिक डीआरडीओ शामिल थे।

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