चेन्नई, 18 अक्टूबर (आईएएनएस)। इंश्योरेंस पेनीट्रेशन को प्रीमियम आय की एक माप के रूप में देखने से अधिक इसे वित्तीय और सामाजिक विकास के एक पैमाने के रूप में देखा जाना चाहिए। यह बात एक अध्ययन रपट में कही गई है।
यह अध्ययन एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एसोचैम) और क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने मिलकर किया है।
रविवार को जारी एक बयान में एसोचैम ने इंश्योरेंस पेनीट्रेशन को वित्तीय और सामाजिक विकास के पैमाने के रूप में देखने के लिए देश में एक बीमा सूचकांक स्थापित करने की जरूरत पर बल दिया।
एसोचैम ने कहा कि बीमा विकास अध्ययन को सिर्फ प्रीमियम आंकड़े और पॉलिसी की संख्या तक सीमित रखना ही काफी नहीं है।
उद्योग संघ ने कहा, “बीमा पैरामीटर को पैमाने में शामिल कर वित्तीय अंडर-पेनीट्रेशन की सीमा के बारे में अधिक समग्र दृष्टि हासिल की जा सकती है।”
अध्ययन के मुताबिक, बीमा एजेंटों के पेनीट्रेशन के विश्लेषण सहित बीमा पेनीट्रेशन पर व्यापक दृष्टि की जरूरत है।
समावेशी विकास के लिए माइक्रो इंश्योरेंस और लाइवलीहुड इंश्योरेंस जैसे अन्य सभी बीमा की पेनीट्रेशन पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
लिंग आधारित दृष्टि भी जरूरी है। बीमा और वित्तीय सेवा महिला और पुरुष दोनों के लिए सुलभ है या नहीं, यह जानने के लिए महिला पॉलिसी धारकों की संख्या जाननी जरूरी है।
अध्ययन के मुताबिक, डाक बीमा एक खर्चीला वितरण चैनल है, लेकिन इसकी पहुंच देश भर में है।
डाक बीमा पेनीट्रेशन से देश में बीमा की संभावना का पता चलता है। वित्तीय सेवा की सुलभता पर सर्वागीण दृष्टि से यह समझा जा सकता है कि वास्तविक स्थिति आदर्श स्थिति से कितनी अलग है।
अध्ययन के मुताबिक, इस सूचकांक का उपयोग औद्योगिकी हस्तियां और नीति निर्माता भी वित्तीय समावेशीकरण और संभावित बाजार की तरफ बढ़ने में कर सकते हैं।
भारत में 2013-14 में बीमा पेनीट्रेशन 3.9 फीसदी थी, जबकि वैश्विक औसत 6.3 फीसदी थी। वित्तीय जागरूकता और निरक्षरता के कारण देश में बीमा पेनीट्रेशन कम है।
साथ ही बीमा घनत्व के मामले में भी भारत विकसित देशों से काफी पीछे है।
बीमा घनत्व प्रीमियम और कुल आबादी का अनुपात होता है, जबकि बीमा पेनीट्रेशन प्रीमियम और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अनुपात होता है।
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