मुंबई, 5 नवंबर (आईएएनएस)। लेखिका अरुं धति राय और 23 अन्य लेखकों तथा फिल्मकारों ने देश में बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ गुरुवार को अपने राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाने का ऐलान किया। पुरस्कार वापसी की इस मुहिम के खिलाफ अभिनेता अनुपम खेर ने मार्च निकालने का फैसला किया है।
पुरस्कार लौटाने वालों में फिल्मकार सईद मिर्जा और कुंदन शाह भी शामिल हैं। इन सभी लोगों का कहना है कि देश के ‘मौजूदा माहौल’ और ‘जीवंत जनतंत्र की धज्जियां उड़ने’ के प्रति अपने भय की तरफ देश का ध्यान खींचने के लिए वे प्रतीकात्मक रूप से यह कदम उठा रहे हैं।
सईद मिर्जा को 1996 में उनकी फिल्म ‘नसीम’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।
कुंदन शाह को उनकी चर्चित फिल्म ‘जाने भी दो यारों’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
जिन अन्य कलाकारों और लेखकों ने पुरस्कार लौटाने का फैसला किया है उनमें राय, मिर्जा और शाह के अलावा वीरेंद्र सैनी, संजय काक, अजय रैना, तपन बोस, रंजन पालित, अनवर जमाल, श्रीप्रकाश, प्रदीप कृष्ण, तरुण भारतीय, अमिताभ चक्रवर्ती, मधुश्री दत्ता, इरेना धर मलिक, पी.एम.सतीश, सत्यराज नागपाल, मनोज लोबो, रफीक इलियास, सुधीर पलसाने, विवेक सच्चिदानंद, सुधाकर रेड्डी यक्कांती, मनोज निथरवाल और अभिमन्यु डांगे शामिल हैं।
सरकार को भेजे गए 190 लोगों के हस्ताक्षर वाले पत्र में भी इन लोगों के नाम शामिल हैं। इन्होंने इस पत्र में सरकार से पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट के छात्रों की मांगों पर ध्यान देने का आग्रह किया है।
पुरस्कार लौटाने वाले 24 लोगों ने एक बयान में इस बात पर निराशा जताई है कि सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं और समर्थकों ने पुरस्कार लौटाने वाले 12 फिल्मकारों को अपमानित किया।
अरुं धति राय ने इंडियन एक्प्रेस में प्रकाशित अपने लेख में कहा कि वह 1989 में सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए मिले राष्ट्रीय पुरस्कार को देश में मौजूद ‘वैचारिक क्रूरता’ के खिलाफ विरोध जताने के लिए लौटा रही हैं।
उन्होंने कहा कि देश में जो कुछ हो रहा है, उन्हें उस पर ताज्जुब नहीं है। उन्होंने दादरी के पास गांव में गोमांस की अफवाह पर आदमी की हत्या को एक ‘बहुत गहरी बीमारी’ बताया।
राय ने कहा, “ये हत्याएं गहरी बीमारी के लक्षण मात्र हैं। जो जिंदा हैं उनकी भी जिंदगी जहन्नुम बना दी गई है। पूरी की पूरी आबादी-दलित, आदिवासी, मुसलमान, ईसाई- को आतंक के साए में जीने पर मजबूर किया जा रहा है। किसी को नहीं पता कि कब कहां से हमला हो जाएगा।”
अपने लेख में राय ने कहा है कि 2005 में जब कांग्रेस की सरकार थी, उस वक्त उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया था। इसलिए इस मामले को कांग्रेस बनाम भाजपा की बहस से परे रखिए।
उन्होंने लिखा, “बात इन सब बातों से कहीं आगे जा चुकी है।”
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