भोपाल गैस त्रासदी : हक की लड़ाई में बिछुड़े 20 हजार साथी

Bhopal photoभोपाल, 1 दिसंबर (आईएएनएस)| नाम है अब्दुल जब्बार, काम है भोपाल के गैस पीड़ितों के हक के लिए संघर्ष करना और उन्हें स्वावलंबी बनाना। एक संगठन बनाकर बीते 30 वर्ष के संघर्ष में जब्बार पीड़ितों को हक का कुछ हिस्सा दिलाने में तो सफल रहे हैं, मगर अब भी बहुत कुछ मिलना बाकी है। उन्हें इस बात का मलाल है कि उनकी इस संघर्ष यात्रा के दौरान 20 हजार से ज्यादा साथी उनसे बिछुड़ गए हैं।

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में दो दिसंबर 1984 की रात में यूनियन कार्बाइड संयंत्र से जहरीली गैस रिसी और एक रात में ही उसने तीन हजार से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुला दिया। वहीं हजारों लोग बीते 31 वर्षो में जहरीली गैस से मिले रोगों के चलते मारे जा चुके हैं और अभी भी हजारों लोग मौत की दहलीज पर खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

हादसे की रात से ही अब्दुल जब्बार ने पीड़ितों के बीच जाकर काम शुरू कर दिया था। उस वक्त उनकी उम्र 28 वर्ष थी, अब 58 वर्ष के हैं। हादसे के एक वर्ष बाद उन्होंने भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन बनाया और संघर्ष का सिलसिला आगे बढ़ाया।

अपने संघर्ष की कहानी का ब्योरा देते हुए अब्दुल जब्बार ने आईएएनएस को बताया कि पीड़ितों के हक की लड़ाई में पहली सफलता 1988 में मिली जब सर्वोच्च न्यायालय ने गुजारा भत्ता देने का निर्णय सुनाया। उसके बाद फरवरी 1989 में भारत सरकार और यूनियन कार्बाइड के बीच भोपाल समझौता हुआ। इसके मुताबिक घायलों को 25-25 हजार और मृतकों को एक-एक लाख मिला। इसके बाद प्रोरेटा पर घायलों को 25-25 हजार और मृतकों के परिजनों को एक-एक लाख अतिरिक्त मिला।

जब्बार बताते हैं कि मृतकों की संख्या को लेकर शुरू से विवाद रहा है, मगर वर्ष 2001 में एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया जिसमें पता चला कि 15 हजार 276 लोगों की मौत हुई है और पांच लाख 76 हजार से ज्यादा लोग गैस के दुष्प्रभावों का शिकार है। दूसरी ओर उनके संगठन की लड़ाई के चलते ही वर्ष 2010 में भोपाल के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत ने यूनियन कार्बाइड के अफसरों को दो-दो वर्ष की सजा सुनाई, मगर अफसोस है कि इस पर अब तक अमल नहीं हुआ है।

उन्होंने आगे बताया कि वर्ष 2001 में आए मौत और प्रभावितों के आंकड़ों के आधार पर यूनियन कार्बाइड से पांच गुना और अधिक मुआवजा दिए जाने के लिए उनके संगठन ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की, इसी बीच तत्कालीन सरकार ने संख्या सुधार के लिए केरेटिव पिटीशन दायर कर दी। दोनों याचिकाएं लंबित हैं।

जब्बार बताते हैं कि एक तरफ उनकी न्यायालयीन लड़ाई जारी है तो दूसरी ओर उनका संगठन सड़क पर उतरता रहता है। शाहजहांनी पार्क इस बात का गवाह है जहां 1986 से हर मंगलवार और शनिवार को गैस पीड़ित इकट्ठा हेाकर अपनी आवाज बुलंद करते रहे हैं, अब सिर्फ शनिवार को लोग इकट्ठा होते हैं, क्योंकि सप्ताह में दो बार आने पर किराए में ज्यादा धनराशि खर्च हो जाती है।

गैस पीड़ितों की लड़ाई के लिए जहां संगठन बनाया था वहीं प्रभावितों को आर्थिक तौर पर सक्षम बनाने के लिए स्वाभिमान केंद्र चलाया जा रहा है। इस केंद्र में सिलाई, कढ़ाई, जरी का काम और कंप्यूटर का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह केंद्र साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल है, यहां हिंदू-मुस्लिम महिलाएं न सिर्फ एक साथ प्रशिक्षण लेती हैं, बल्कि साथ खाने में भी परहेज नहीं करती। इस केंद्र से अब तक आठ हजार से ज्यादा महिलाएं प्रशिक्षण पा चुकी है।

जब्बार बताते हैं कि बीते 30 वर्ष के इस संघर्ष के दौरान उनका साथ देने वाले 20 हजार से ज्यादा लोगों को उन्होंने बिछुड़ते देखा है। ये वे लोग है जो उनके संघर्ष के न केवल साथी थे बल्कि उनसे पारिवारिक रिश्ते भी थे। कई दफा तो उन्हें किसी की मौत की खबर आई तो लगा कि अगर उसे बेहतर इलाज मिल जाता तो वह बच जाता, मगर ऐसा हो न सका।

राजधानी के बीचों बीच सेंटल लाइब्रेरी के करीब स्थित भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के कार्यालय में मौसम कोई भी हो हर वक्त लोगों के आने जाने का सिलसिला लगा रहता है, कोई अपनी समस्या बताता है तो कोई समस्या के निपट जाने का हाल बताता है। हादसे को हुए भले 31 वर्ष गुजर गए हों, मगर प्रभावितों में अपने हक की लड़ाई का जज्बा कम नहीं हुआ है।

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