काठमांडू, 15 दिसंबर (आईएएनएस)। नेपाल सरकार ने भूकंप से तबाह जगहों के पुनर्निर्माण के लिए ‘नेपाल पुनर्निर्माण प्राधिकरण’ बनाने से संबंधित विधेयक मंगलवार को संसद में पेश किया।
इसके अलावा आंदोलनरत मधेसी राजनैतिक दलों और नेपाल की तराई के जातीय समूहों की मांगों से संबंधित एक संविधान संशोधन विधेयक भी संसद में पेश किया है।
नेपाल पुनर्निर्माण प्राधिकरण के गठन का मामला इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) से जुड़े मुद्दों की वजह से खिंच गया था। पूर्ववर्ती नेपाली कांग्रेस सरकार इसके लिए अध्यादेश लाई थी और गोविंदा पोखरियाल को इसका सीईओ बनाया था। लेकिन, संसद में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) बाद में अध्यादेश को विधेयक में बदलने से असहमत हो गई थी।
25 अप्रैल को आए भूकंप में 9 हजार लोगों की मौत हुई थी। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेपाल को 4 अरब डालर की मदद मिलने की बात कही गई। लेकिन, सक्षम प्राधिकरण के अभाव में सरकार एक पैसा भी नहीं खर्च सकी।
जाड़े के मौसम में भूकंप पीड़ितों की दुर्दशा पर चौतरफा आलोचना के बाद सरकार ने सभी राजनैतिक दलों से बात कर विधेयक को अंतिम रूप दिया और इसे सदन में पेश किया।
संसद में पेश एक अन्य महत्वपूर्ण विधेयक में मधेसी समुदाय और तराई के अन्य जातीय समुदाय की मांगों को पूरा करने की बात कही गई है।
ये समुदाय देश के नए संविधान का विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि नए राज्यों के गठन में इनकी आबादी का ध्यान नहीं रखा गया। साथ ही इन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया।
मधेसी दल संविधान संशोधन विधेयक पेश होने से खुश नहीं हैं। उनका कहना है कि उनसे सलाह किए बिना ही इसे पेश कर दिया गया है। उनका कहना है कि उन्होंने केवल ‘नेपाल पुनर्निर्माण प्राधिकरण’ विधेयक को पेश करने पर सहमति दी थी।
संविधान संशोधन विधेयक में निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या के आधार पर सीमांकन करने और नेपाल सेना समेत तमाम सरकारी संस्थाओं में जातीय अल्पसंख्यकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की बात कही गई है।
नेपाल के दक्षिणी मैदानी इलाके में देश की 50 फीसदी से अधिक आबादी रहती है। अगर विधेयक को मंजूरी मिल गई और संविधान में इसके हिसाब से संशोधन हो गया तो संसद में अगले चुनाव में मैदानी इलाके का बहुमत प्रतिनिधित्व होगा।
dharmpath.com dharmpath