महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों ने बुधवार को यहां बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-2005-06 (वजन आधारित) के अनुसार प्रदेश में कुपोषण दर 47.1 प्रतिशत थी, जो कम होकर अब 30 प्रतिशत रह गई है। इस प्रकार पिछले दस वर्षो में कुपोषण दर में 17 प्रतिशत की उल्लेखनीय कमी आई है। कुपोषण दर में यह गिरावट निरंतर जारी है।
कुपोषण एक चक्र है जो खान-पान के गलत तरीकों, भोजन में पौष्टिकता की कमी जैसे कई कारणों से होती है। इस समस्या से निपटने के लिए राज्य सरकार द्वारा अनेक योजनाएं संचालित की जा रही है। माता के गर्भ से ही और जन्म के बाद शिशु स्वस्थ और मजबूत हो, इसके लिए गर्भवती तथा शिशुवती माताओं को आंगनबाड़ी केन्द्रों के जरिए हर सप्ताह टेक होम राशन पद्धति से पोषण आहार प्रदान किया जा रहा है। इन माताओं को आंगनबाड़ी केन्द्रों में उनके आहार के साथ बच्चों के आहार के बारे में जानकारी भी दी जाती है। बच्चों के कुपोषण के स्तर की जांच के लिए प्रदेश में हर वर्ष वजन त्यौहार मनाया जाता है तथा इस दौरान राज्य के सभी बच्चों का वजन लिया जाता है।
महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा कुपोषण की रोकथाम के लिए वर्ष 2012 से समुदाय आधारित नवा जतन योजना भी संचालित की जा रही है। योजना के तहत 50 हजार से ज्यादा बच्चों को मुक्ति मिल चुकी है। गंभीर कुपोषित बच्चों के इलाज के लिए प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों सहित 62 स्थानों में पोषण पुनर्वास केन्द्र स्थापित किए गए हैं। कुपोषण की दृष्टि से राज्य के 17 हाई बर्डन जिलों में 12 दिवसीय स्नेह शिविरों का आयोजन भी किया जा रहा है। इन शिविरों के माध्यम से सात हजार से अधिक बच्चे सामान्य श्रेणी में आ चुके हैं।
अधिकारियों ने बताया कि इन शिविरों के माध्यम से सात हजार से ज्यादा बच्चे सामान्य श्रेणी में आ चुके हैं। राज्य में शून्य से छह वर्ष की बालिकाओं के स्वास्थ्य औैर पोषण स्तर में सुधार लाने, बालिकाओं की देखरेख के लिए परिवार को जागरूक करने के लिए राज्य में दत्तक पुत्री सुपोषण योजना संचालित की जा रही है। वर्ष 2014-15 में 9715 गंभीर कुपोषित बालिकाओं को समुदाय द्वारा दत्तक लिया गया है, जिनमें से करीब एक हजार दो सौ बालिकाएं कुपोषण से बाहर हो चुकी हैं, 4198 बालिकाओं के पोषण स्तर में परिवर्तन हुआ है, तीन हजार से ज्यादा बालिकाएं गंभीर कुपोषण से मध्यम श्रेणी में आ गई हैं।
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