किशोर का अपराध गंभीर तो सजा भी वयस्क जैसी हो : स्वाति मालीवाल (साक्षात्कार)

नई दिल्ली, 25 दिसंबर (आईएएनएस)। आपराधिक मामलों में किशोरों के बढ़ रहे रुझान पर देश दो धड़ों में बंट गया है। समाज का एक वर्ग जघन्य अपराधों में नाबालिगों की उम्र घटाने के पक्ष में है, जबकि दूसरा धड़ इसे बाल अधिकारों का हनन बता रहा है। नाबालिगों की उम्र पर बहस और राज्यसभा में किशोर न्याय (बाल संरक्षण एवं देखरेख) विधेयक 2015 के पारित होने पर दिल्ली महिला आयोग (डीसीडब्ल्यू) की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने आईएएनएस से बातचीत में इस विधेयक का पारित होना ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ बताया।

नई दिल्ली, 25 दिसंबर (आईएएनएस)। आपराधिक मामलों में किशोरों के बढ़ रहे रुझान पर देश दो धड़ों में बंट गया है। समाज का एक वर्ग जघन्य अपराधों में नाबालिगों की उम्र घटाने के पक्ष में है, जबकि दूसरा धड़ इसे बाल अधिकारों का हनन बता रहा है। नाबालिगों की उम्र पर बहस और राज्यसभा में किशोर न्याय (बाल संरक्षण एवं देखरेख) विधेयक 2015 के पारित होने पर दिल्ली महिला आयोग (डीसीडब्ल्यू) की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने आईएएनएस से बातचीत में इस विधेयक का पारित होना ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ बताया।

उन्होंने हालांकि अभी भी इस विधेयक में कुछ खामियां होने की बात कही है, जिन पर काम किया जाना जरूरी है।

इस विधेयक को मंजूरी मिलने की जरूरत पर स्वाति ने बताया कि लोगों में खौफ बैठाना बहुत जरूरी है। अब तक यही मानसिकता रही है कि जघन्य से जघन्य अपराध करने पर भी नाबालिग उम्र का हवाला देकर बड़ी आसानी से बच निकल सकते हैं। अब तक इसी खामी का फायदा उठाया जाता रहा है।

नाबालिगों को बहला-फुसलाकर उनसे अपराध करवाना हो या फिर नाबालिगों की विकृत मानसिकता की वजह से अपराध को अंजाम देने की उनकी प्रवृत्ति के पीछे कारण यही रहा है कि उन्हें पता है कि वे किशोर कानून का मनमाफिक इस्तेमाल कर सकते हैं।

पूर्व के कानून में 18 साल से कम उम्र की आयु के किशोरों पर वयस्कों के समान कानून लागू नहीं होता था, लेकिन इस संशोधित विधेयक में दुष्कर्म सहित जघन्य अपराधों में कुछ शर्तों के साथ किशोर की आयु 18 से घटाकर 16 कर दी गई है। इस विधेयक के लागू हो जाने के बाद जघन्य अपराध करने पर 16-18 वर्ष की आयु के नाबालिगों पर वयस्कों के समान मुकदमा चलाने का प्रावधान है।

उन्हें 21 वर्ष की आयु तक निरीक्षण केंद्र में रखा जाएगा और यदि उसके बाद भी उनमें सुधार नहीं होता है तो उनकी रिहाई की जाए या नहीं उस पर फैसला होगा। इस विधेयक में किशोर न्याय बोर्ड के पुनर्गठन का प्रावधान भी है।

ऐसा नहीं है कि इस विधेयक को चारो ओर से समर्थन मिल रहा है। कई बाल अधिकार समूह और कार्यकर्ता इस विधेयक का पुरजोर विरोध भी कर रहे हैं। इस विरोध पर स्वाति कहती हैं कि जो लोग इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं। वे वास्तविकता से अवगत नहीं हैं। कुछ संगठन तो ऐसे हैं, जो अपनी दुकान चलाने के लिए भेड़चाल में चले जा रहे हैं।

समाज में लोगों के बीच डर बैठाना बहुत जरूरी है। किसी भी सामाजिक व्यवस्था में दंड का प्रावधान होना बहुत जरूरी है, अन्यथा अपराध में इजाफा ही होगा।

दो चीजें होती हैं, बचाव और डर। देश में बढ़ रहे अपराधों से स्वयं को सुरक्षित रखना और अपराधकर्ता में अपराध करने से पहले और बाद में उसकी सजा का डर पैदा करना। हालांकि, ऐसा नहीं है कि इस विधेयक के लागू हो जाने के बाद महिलाएं सुरक्षित हो जाएगी या अपराध पर लगाम लग जाएगी, लेकिन समाज में एक खौफ बनाना बहुत जरूरी है।

भारत में बीते तीन साल में नाबालिग अपराधों में वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, साल 2012 में कुल 23,लाख 87 हजार 188 अपराधों में से 27 हजार 936 नाबालिग थे। 2013 में 26 लाख 47 हजार 722 अपराधों में नाबालिगों की संख्या 31 हजार 725 रही, जबकि 2014 में 28 लाख 51 हजार 563 अपराधों में नाबालिगों की संख्या 33 हजार 526 रही।

इतना ही नहीं, वर्ष 2011 में 11,000 लोगों के खिलाफ आपराधिक मामलों में एफआईआर दर्ज की गई थी, लेकिन उसमें से सिर्फ नौ लोगों को ही सजा मिल पाई है। ऐसी स्थिति में सख्ती करनी बेहद जरूरी है। पुलिस आंकड़े भी बताते हैं कि देश में 16 से 18 साल की उम्र के किशोरों के बीच अपराध की प्रवृत्ति बढ़ी है।

उम्र विवाद पर स्वाति कहती हैं कि किशोर की उम्र को लेकर दुनियाभर के देशों में अलग-अलग राय है। संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार संधि में वयस्क होने की उम्र 18 साल मानी गई है, लेकिन ब्रिटेन, अमेरिका और कई यूरोपीय देशों में नाबालिगों के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं। ब्रिटेन में तो नाबालिग अपराधियों को सश्रम सजा तक देने का प्रावधान है। कई यूरोपीय देशों में तो नाबालिगों की उम्र घटाकर 14 भी की गई है तो ऐसे में भारत में नाबालिगों की उम्र पर विवाद खड़ा करना बेमानी है।

सबसे पहले 1986 में राजीव गांधी सरकार ने किशोर न्याय संबंधी विधेयक पेश किया था, जिसमें उम्र की सीमा 18 से घटाकर 16 की गई थी लेकिन 2000 में तत्कालीन राजग सरकार ने इसे दोबारा बढ़ाकर 18 कर दिया।

निर्भया कांड के नाबालिग (जो अब बालिग हो चुका है) की रिहाई पर दिल्ली सरकार द्वारा उसे 10,000 रुपये की आर्थिक मदद और सिलाई मशीन दिए जाने पर हो रहे विरोध पर स्वाति का कहना है कि किशोर न्याय विधेयक में नाबालिगों के पुनर्वास का प्रावधान है, जब कानून ऐसा करने के निर्देश दे रहा है और सरकार कर रही है तो हम इस कदम पर उंगली उठाने वाले कौन होते हैं?

दोषी की सजा पूरी होने के बाद उसका जीवन तो समाप्त नहीं हो जाता। बाल सुधार गृह या जेल से बाहर आने के बाद उसे अपनी सामान्य जिंदगी फिर से शुरू करने के लिए सरकारी मदद की जरूरत है, इसमें विरोध किस बात का?

स्वाति आगे कहती हैं कि इस विधेयक में हर जिले में जुवेनाइल बोर्ड (जेजेबी) और बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) बनाए जाने का प्रावधान है। जेजेबी के पास नाबालिग अपराधी को बाल सुधार गृह भेजने और फिर उस पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने का अधिकार होगा।

स्वाति कहती हैं कि सजा उम्र देखकर नहीं, अपराध देखकर दी जानी चाहिए। किसी भी कानून का मूल उद्देश्य दोषियों को उचित सजा देकर उनमें सुधार कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में फिर से लाना है।

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