ढाका, 6 जनवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश की शीर्ष अदालत ने बुधवार को इस्लामिस्ट पार्टी के प्रमुख मोतीउर रहमान निजामी को दी गई फांसी की सजा को बरकरार रखा। उन्हें 1971 में मुक्ति संग्राम के दौरान किए गए युद्ध अपराधों के लिए यह सजा सुनाई गई है।
जस्टिस सुरेंद्र कुमार सिन्हा की अगुआई में सर्वोच्च अदालत की चार सदस्यीय पीठ ने यह फैसला सुनाया था।
73 वर्षीय निजामी जमाते इस्लामी पार्टी के अध्यक्ष हैं। वे खालिदा जिया के शासन काल के दौरान 2001 से 2006 कृषि और उद्योग मंत्री के पद पर थे। अदालत ने उन्हें तीन आरोपों में मौत की सजा और अन्य दो आरोपों में आजीवन कारावास की सजा दी है।
पिछले साल 29 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल (आईसीटी-1) ने निजामी को बुद्धिजीवियों की सामूहिक हत्या मामले में युद्ध अपराधी घोषित करते हुए मौत की सजा सुनाई थी।
निजामी पर साल 2012 में 1971 की लड़ाई के दौरान मानवता के खिलाफ अपराध जिसमें लूट, नरसंहार, आगजनी, दुष्कर्म और जबरदस्ती इस्लाम कबूलवाना समेत 16 आरोप लगाए गए थे।
निजामी पर यह अभियोग चलाया गया कि वे अल बद्र जो कि पाकिस्तानी आर्मी की सहायक बल के रूप में काम कर रही थी, के मुख्य संगठनकर्ता थे। इस संगठन ने लड़ाई के खत्म होने के बाद बंगाली बुद्धिजीवियों का योजना बनाकर नरसंहार किया था।
साल 2010 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने युद्ध अपराध ट्रिब्यूनल का गठन किया था। इसमें निजामी समेत जमात के शीर्ष नेताओं पर युद्ध अपराध के मुकदमे की सुनवाई चली। निजामी के साथ जमात के तीन नेताओं अब्दुल कदीर मौला, मुहम्मद कामारूज्जमां और अली अहसान मोहम्मद मुजाहिद को भी मौत की सजा सुनाई गई है।
इनके अलावा जमात के महासचिव मुजाहिद और विपक्षी बीएनपी (बांग्ला देश नेशनिस्ट पार्टी) के नेता सलाउद्दीन कादिर चौधरी को 22 नवंबर को फांसी की सजा दी गई थी।
बीएनपी और जमात दोनों ही पार्टियों ने अदालत के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि यह सरकार के इशारे पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र की भागीदारी या निरीक्षण के बिना गठित की गई घरेलू अदालत है।
मुस्लिम बहुल बांग्लादेश को 1971 तक पूर्वी पाकिस्तान कहा जाता था। हसीना सरकार के मुताबिक मुक्ति संग्राम के दौरान लगभग 30 लाख लोगों को मार दिया गया जबकि स्वतंत्र शोधकर्ताओं के अनुसार 3 लाख से 5 लाख के बीच लोगों की मौत हुई थी।
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