पंजाब में मेडिकल लापरवाही के मामले सबसे ज्यादा

नई दिल्ली, 5 मार्च (आईएएनएस)। आठवीं सालाना मेडिको लीगल रिव्यू की रिपोर्ट में कहा गया है कि मेडिकल लापरवाही के सबसे ज्यादा 24 फीसदी मामले पंजाब में दर्ज किए गए हैं। पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में डॉक्टरों की लापरवाही के मामले क्रमश: 17, 16 और 11 फीसदी दर्ज किए गए हैं। समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, मरीजों को अस्पताल से ही दवा खरीदने के लिए मजबूर करने के मामलों में बढ़ोतरी हुई है।

सालाना मेडिको लीगल समीक्षा, 2016 सर्वोच्च न्यायालय के वकील महेंद्र कुमार बाजपेयी की ओर से नई दिल्ली में शनिवार को पेश की गई।

नई दिल्ली के बाद पुणे, मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई और बेंगलुरू में यह समीक्षा पेश हुई। इस कार्यक्रम में स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी, नियामक, एमसीआई आफिस के पदाधिकारी, राष्ट्रीय और राज्य उपभोक्ता आयोग के न्यायाधीश शामिल हुए।

चिकित्सा संबंधी कानूनों के विद्वान और प्रमुख वक्ता वकील महेंद्र कुमार बाजपेयी ने कहा कि डॉक्टरों के खिलाफ बीमारी का पता लगाने में देरी करने, बीमारी का पता लगाने में नाकाम रहने और गलत बीमारी का इलाज शुरू करने के मामलों में इस साल बढ़ोतरी हुई है।

इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन एंड लॉ (आईएमएल) की ओर से 2009 के बाद से हर साल सालाना मेडिको लीगल रिव्यू किया जाता है। इसमें हेल्थ केयर प्रोवाइडर्स के नजरिए से पिछले साल चिकित्सा कानूनों में आए बदलाव की समीक्षा की जाती है और मेडिको लीगल नजरिए से आने वाले साल के ट्रेंड की भविष्यवाणी की जाती है।

2015 में यह देखा गया कि ज्यादा से ज्यादा हैरान-परेशान मरीज केवल अस्पतालों पर ही केस कर रहे हैं, डॉक्टरों पर नहीं। इस तरह की गड़बड़ी दो दिलचस्प मामलों से सामने आई। इस तरह का पहला मामला आंध्रप्रदेश से (डॉ. एम. सरोजा देवी वर्सेज गल्ला जयंती) था, जिसमें कोर्ट के निर्देश के बावजूद लापरवाही से गलत सर्जरी करने वाले डॉक्टर को मरीज ने मामले में पक्ष नहीं बनाया था। कोर्ट के सामने इस मामले में अस्पताल को लापरवाह ठहराने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था।

एडवोकेट बाजपेयी का कहना है कि कानून जीवंत है। हर दिन दिए जाने वाले फैसले में मौजूदा कानूनों को बदलने की क्षमता है। यह बदलाव हर किसी पर असर डालते हैं, लेकिन डॉक्टरों पर ये गहरा असर डालते हैं। डॉक्टरों या अस्पतालों पर होने वाले मुकदमों में बढ़ोतरी और बचाव के वैध उपाय की अज्ञानता के मद्देनजर अब यह डॉक्टरों के लिए जरूरी हो गया है कि वह मेडिकल कानूनों में आने वाले बदलाव की जानकारी रखें और आवश्यक सावधानी बरतें।

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