हरिद्वार : जलेगी अश्लील चित्रों व गंदे साहित्य की होली

हरिद्वार, 8 मार्च (आईएएनएस)। शांतिकुंज स्थित अखिल विश्व गायत्री परिवार की ओर से इस बार होली पर्व पर होलिका दहन के साथ अश्लील चित्रों व साहित्य की होली जलाई जाएगी। यह बात गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पंड्या ने आईएएनएस से कही।

उन्होंने बताया कि शांतिकुंज के निर्णयानुसार, इस बार होली पर्व पर होलिका दहन के साथ अश्लील चित्रों व अश्लील साहित्य की होली जलाई जाएगी।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर डॉ. पंड्या ने सभी कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वह महिलाओं के सम्मान को बचाने के लिए जगह-जगह लगे अश्लील चित्रों व साहित्य की होली जलाएं। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार द्वारा इस वर्ष 23 और 24 मार्च को एक साथ 1459 स्थानों पर ये कार्यक्रम देशभर में होंगे और यह एक आंदोलन का प्रारूप होगा।

आयोजन की महत्ता बताते हुए डॉ. पंड्या ने कहा कि सबने महात्मा गांधी के साथ या अलग से उन तीन बंदरों का चित्र अवश्य देखा होगा, जिसमें एक बंदर दोनों हाथों से अपनी आंख बंद किए हुए है। दूसरा कान और तीसरा मुंह बंद किए हुए है। इसका तात्पर्य है ‘बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो, बुरा मत सुनो।’

उन्होंने कहा कि किसी चित्र या ²श्य को देखकर उससे संबंधित अच्छाई या बुराई का प्रभाव अवश्य पड़ता है हम पर। बुरे चित्र देखने पर बुराइयां और अच्छे ²श्य देखने पर अच्छाइयां पनपती हैं।

डॉ. पंड्या ने कहा, “वस्तुत: जो कुछ भी हम देखते हैं, उसका सीधा प्रभाव हमारे मन और मस्तिष्क पर पड़ता है। किसी चित्र या ²श्य विशेष को बार-बार देखने पर उसका सूक्ष्म प्रभाव हमारे अंतरमन पर अंकित होने लगता है और जितनी बार उसे देखा जाता है, उतना ही वह स्थायी और परिपक्व बनता जाता है।”

उन्होंने कहा, “हमारा अव्यक्त मन कैमरे की प्लेट के समान है, जिस पर नेत्रों के लेंस से जो छाया गुजरती है, वही उस पर अंकित हो जाती है। हम अच्छा या बुरा जो कुछ भी देखते हैं। उसका सीधा हमारे अंतरमन पर सूक्ष्म चेतना पर होता है।”

उन्होंने आगे कहा कि प्रत्येक चित्र का अस्तित्व केवल उसके आकार प्रकार तथा रंग रूप तक ही सीमित नहीं रहता, वरन उसके पीछे कुछ आदर्श होते हैं। कुछ विचार, धारणाएं और मान्यताएं होती हैं। ये अच्छी भी हो सकती हैं और बुरी भी किंतु होती अवश्य हैं।

डॉ. पंड्या ने कहा कि वस्तुत: चित्र की अपनी एक भाषा होती है जिसके माध्यम से चित्रकार समाज में अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है। प्रत्येक चित्र में उससे हाव, भाव, भंगिमा, पोशाक, अंग प्रत्यंग, मुख, मुद्रा आदि में कुछ संकेत भरे होते हैं। चित्र या ²श्य देखने के साथ-साथ उनसे संबंधित अच्छी-बुरी धारणा, संकेत भी मनुष्य के मन पर अंकित हो जाते हैं।

उन्होंने कहा, “हमारा मन इन आदर्शो, संकेतों को चुपचाप ग्रहण करता रहता है। चित्र दर्शन के साथ-साथ उसमें निहित अच्छाई या बुराई भी मानस पटल पर अंकित हो जाती है।”

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