नई दिल्ली, 10 मार्च (आईएएनएस)। भारत में किडनी फेल होने के मामलों में पिछले 15 सालों में दोगुनी वृद्धि हुई है और डायलिसिस करवाने वाले मरीजों की संख्या में 10 फीसदी की वृद्धि हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने गुरुवार को इसकी जानकारी दी।
मुंबई के एसआरवी अस्पताल के कंसलटेंट नेफ्रोलोजिस्ट डॉ. राजेश कुमार ने बताया, “अनुमान के मुताबिक लगभग 75,000 मरीज इस समय डायलिसिस पर है और उनकी संख्या सालाना 10 से 20 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है। अब सवाल यह है कि क्या भारत में तेजी से बढ़ती किडनी के मरीजों की संख्या को संभालने के लिए संसाधन व विशेषज्ञ हैं।”
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत स्वास्थ्य क्षेत्र पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का एक फीसदी खर्च करता है, जबकि चीन 3 फीसदी और अमेरिका 8.3 फीसदी खर्च करता है।
पहले के आंकड़ों से पता चला था कि किडनी के रोग के शिकार 65 फीसदी मरीजों को समय पर डायलिसिस व उपचार नहीं मिल पाता है।
सेवेन हिल्स और ब्रीच कैंडी अस्पताल के डायबेटोलॉजिस्ट डॉ. प्रदीप गाडगे के मुताबिक किडनी के फेल होने का प्रमुख कारण मधुमेह की बीमारी है और अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में इसके 10 लाख मरीज डायलिसिस के कारण ही जिन्दा हैं।
उन्होंने कहा, ” भारत में मधुमेह के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है इसलिए किडनी फेल होने के खतरे वाले मरीजों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। सालाना 3.5-4 मामले किडनी में गड़बड़ी संबंधी मामले सामने आते ैहैं। ”
वोकहार्ड्ट अस्पताल के डॉ. एम. एम. बहादुर का कहना है, “हर साल 2 लाख मरीजों को डायलिसिस की जरूरत होती है, लेकिन 10 फीसदी से भी कम मरीजों को यह उपलब्ध हो पाता है। क्योंकि इस पर आने वाले खर्च से लेकर उपलब्धता तक का मसला है।”
स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक अगले दो सालों में जिला स्तर पर अस्पतालों में 2,000 नए डायलिसिस केंद्र खोले जाने हैं।
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