जानलेवा साबित हो सकती है टीबी : विशेषज्ञ

नई दिल्ली, 23 मार्च (आईएएनएस)। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लयूएचओ) के मुताबिक हर साल टीबी के 86 लाख नए मामले सामने आते हैं जिनमें से भारत में पीड़ितों की अनुमानित संख्या 22 लाख है। बाकी देशों के मुकाबले भारत मंे इसके मामले दुगने हैं।

मायकोबैक्टीरियम टयूब्रक्यूलोसिस नामक संक्रामक बैक्टिया से फैलने वाली यह बीमारी आम तौर पर फेफड़ों पर असर करती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह दिमाग, किडनी, हड्डियों और दिल तक फैल कर जानलेवा साबित हो सकती है। इसके साथ ही यह दिल के रोगों की संभावना भी बढ़ाती है।

शोध में पता चला है कि टीबी के कुल मामलों में से 1 प्रतिशत में दिल के रोग होते हैं। कार्डियोवस्कुलर टीबी, टीबी के बैक्टीरीया से होने वाला एक एक्स्ट्राप्लमनरी रोग है। वैसे तो यह आम नहीं होता था लेकिन अब कार्डियक टीबी के मामले, खास तौर पर एड्स वायरस की मौजूदगी वाले विकासशील देशों में, बढ़ रहे हैं, क्योंकि इससे बीमारी बढ़ती है।

कार्डियक टीबी से पीड़ित के दिल के इर्दगिर्द सूजन आ जाती है, जिससे सीने में दर्द होने और सांस फूलने लगती है। अगर इसकी जांच ना करवाई जाए तो यह बिगड़ कर जानलेवा हो सकती है।

फोर्टिस एस्कोर्ट हस्पताल फरीदाबाद के कार्डियॉलॉजी एचओडी एंड प्रिंसीपल कंसल्टेंट डॉ संजय कुमार कहते हैं कि कार्डियक टीबी दिल के आसपास तरल पदार्थ का संग्रह (पेररिकार्डियल एफयूजन) और दिल के आसपास परत के उमड़ने (कंसट्रिक्टिव पेरीकारडीटीज) के रूप में होता है। कार्डियक टीबी से पीड़ितों में पेरिकार्डियम में टीबी होना आम बात है। अओर्टा और मायोकार्डियम का टीबी दुर्लभ है।

दिल की प्रणाली पर गंभीर प्रभाव और जांच में देरी से पैरिकार्डियल टीबी से मौत होने की दर काफी ज्यादा है। इससे पीड़ित ज्यादातर लोग मध्य उम्र के हैं, जिनका वजन अचानक कम हो जाता है, सांस उखड़ना, सीने में दर्द, लगातार खांसी और एड़ियों में सूजन आ जाती है। मेडिकल क्षेत्र को इस रोग और इसके इलाज के बारे में जागरूकता फैलानी चाहिए।

बिना टीबी वाले लोगों के मुकाबले टीबी के पीड़ितों को बीमारी ठीक हो जाने के कई साल बाद तक भी दिल के रोग होने का खतरा ज्यादा होता है। इस लिए बीमारी से बचना और भी अहम हो जाता है। कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता, रहने की जगह साफ सुथरी न होना और एड्स की मौजूदगी टीबी का मुख्य कारण है। टीबी के कीटाणु नमी के कणों के साथ हवा के जरिए शरीर मे दाखिल हो सकते हैं। कोई पीड़ित खांसने और छींकने से यह रोग फैला सकता है। सांस प्रणाली को स्वच्छ रखना बेहद अहम है।

करीब 40 प्रतिशत भारतीय आबादी टीबी से पीड़ित है। इन में से ज्यादातर को सक्रिय की बजाए अविकसित टीबी है। एड्स के बढ़ते प्रकोप की वजह से मायोबैक्टीरियल बीमारी के मामले बढ़ रहे हैं। एचआईवी वायरस शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को पार करके टीबी बैक्टीरिया के बढ़ोतरी को रोकना मुश्किल बना देता है।

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