नई दिल्ली, 23 मार्च (आईएएनएस)। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा बुधवार को टीबी से बचाव और इलाज के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए रैली निकाली गई।
यह रैली आईएमए हाउस से शुरू होकर आईटीओ तक निकली। इसमें आईएमए सदस्यों, छात्रों और नागरिकों ने भाग लिया। पूरी दुनिया में 24 मार्च को वल्र्ड टीबी डे के रूप में मनाया जाता है।
भारत में टीबी के सबसे ज्यादा मामले पाए जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक 40 प्रतिशत भारतीय टीबी से प्रभावित हैं जिनमें से ज्यादातर को अविकसित टीबी है। डब्लयूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) के 2014 के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के कुल 90 लाख लोग टीबी से पीड़ित है, जिनमें भारत के 22 लाख मामले शामिल हैं। 2014 में टीबी पीड़ितों का अनुमानित आंकड़ा 25 लाख था।
भारत में हर साल 12 लाख लोग टीबी की चपेट में आते हैं। वहीं, टीबी के कारण सालाना 2.7 लाख भारतीयों को मौत हो जाती है। कई अनुमानों में तो दुगनी मौतों की गणना की गई है। टीबी किसी भी उम्र, जाति या वर्ग के व्यक्ति को हो सकता है लेकिन ज्यादातर यह गरीब तबके के पुरुषों को होता है। झुग्गी वासी, आदिवासी, कैदियों और बीमार लोग जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, उनमें टीबी के मामले ज्यादा पाए जाते है।
भारत में टीबी के मरीजों में 40 प्रतिशत बच्चे हैं जिनकी पूरी जांच नहीं हो पाई है। टीबी के इलाज पर काफी ज्यादा खर्च आता है और साल 2006 से 2014 के दौरान भारत में टीबी के इलाज पर 340 अरब डॉलर खर्च किया गया।
आईएमए के मानद महासचिव डॉ केके अग्रवाल ने कहा कि केवल 58 प्रतिशत मामलों को ही दर्ज किया जाता है। एक तिहाई मामलों की जांच ही नहीं होती या जांच के बाद इलाज नहीं होता या फिर जांच और इलाज होता है लेकिन दर्ज नहीं किया जाता। टीबी को खत्म करने के लिए इसके मामलों को दर्ज करने की जरूरत है।
मायकोबैक्टीरियम टयूब्रक्यूलोसिस नामक संक्रामक बैक्टीरिया से फैलने वाली यह बीमारी आम तौर पर फेफड़ों पर असर करती है। यह एक सांस की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के गले और फेफड़ों के जल कणों से से दूसरे व्यक्ति तक फैलती है।
खांसी, खांसी में बलगम और खून, छाती में दर्द, कमजोरी, वजन में कमी, बुखार और रात को पसीना आना आदि इसके लक्षण हैं। छह महीने के एंटीबायटिक्स कोर्स से इसका इलाज हो जाता है। समय पर जांच और इलाज के साथ मामले को दर्ज करना बेहद आवश्यक है।
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