इंफाल, 28 मार्च (आईएएनएस)। मणिपुर में 84 किलोमीटर लंबी जिरीबाम-तुपुल रेल विस्तार परियोजना अपने निर्धारित समय से पीछे चल रही है।
इंफाल, 28 मार्च (आईएएनएस)। मणिपुर में 84 किलोमीटर लंबी जिरीबाम-तुपुल रेल विस्तार परियोजना अपने निर्धारित समय से पीछे चल रही है।
यह परियोजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी ‘एक्ट ईस्ट’ नीति को बढ़ावा देकर दक्षिणपूर्व और पूर्व एशिया की मजबूत अर्थव्यवस्थाओं से संबंध जोड़ने वाली महत्वपूर्ण परियोजना साबित हो सकती है।
एशियन कौंसिल ऑफ लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट के पूर्व पदाधिकारी व लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ अतिन कुमार सेन का कहना है, “जब तक मणिपुर के इस रेल मार्ग को पूरा नहीं कर लिया जाता और इसे म्यांमार की रेल प्रणाली से नहीं जोड़ा जाता, तब तक दिल्ली-हनोई ट्रांस एशियन रेलवे परियोजना संभव नहीं है।”
इस परियोजना की देरी में धन की कमी की समस्या नहीं है, क्योंकि सरकार ने पहले ही जिरीबाम-तुपुल रेल विस्तार परियोजना की क्रियान्वयन एजेंसी नार्थइस्ट फ्रंटियर रेलवे (एनएफआर) को 1,397 करोड़ रुपये आवंटित कर दिए हैं।
इस परियोजना में देरी का कारण कानून-व्यवस्था की स्थिति है। इस परियोजना पर काम कर रही कंपनियों को अपहरण और हमलों की धमकियां मिल रही हैं।
सेन बताते हैं, “यहां कानून-व्यवस्था की स्थिति भयावह है। इस परियोजना पर काम कर रही सभी कंपनियां जबरन वसूली की समस्या से परेशान हैं।”
इस साल जनवरी में कोस्टल परियोजना के एक मैनेजर मुहम्मद मुनीर रजा को जेलियांगरोंग युनाइटेड फ्रंट (जेडयूएफ) के आतंकवादियों ने अगवा कर लिया था।
जेडयूएफ यहां के एक दर्जन से ज्यादा हथियारबंद समूहों में से एक है जो कंपनियों से जबरन वसूली करता है। जब कंपनियां पैसा देने से मना करती हैं तो कई बार मैनेजर और कर्मी निर्माण स्थल से हमले या अगवा होने के डर से भाग जाते हैं।
मणिपुर सरकार इस स्थिति को रोकने पर बहुत कम ध्यान देती है जिसके कारण इस महत्वाकांक्षी परियोजना का काम पटरी से उतरने का खतरा पैदा हो गया है।
इन कंपनियों के लिए सबसे ज्यादा परेशानी वाली बात यह है कि जेडयूएफ को इबोबी सिंह सरकार के एक वरिष्ठ आदिवासी मंत्री का समर्थन प्राप्त है, जिसके कारण महज 25 विद्रोहियों वाले इस संगठन पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
खुफिया अधिकारियों ने बताया कि जेडयूएफ के गठन के पीछे गृह मंत्रालय के एक पूर्व अधिकारी का हाथ है जिसने नागा विद्रोही समूह एनएससीएन के खिलाफ इस संगठन को खड़ा किया था।
एक कंपनी के तुपुल में काम कर रहे एक शीर्ष अधिकारी ने बताया, “अगर महज 25 विद्रोहियों वाला संगठन एक राष्ट्रीय परियोजना को अवैध वसूली के लिए रोक सकता है, तो फिर केंद्र सरकार को इस परियोजना को पूरा करवाने के लिए सेना और केंद्रीय बलों की तैनाती करनी चाहिए।”
लेकिन, गृह मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि यह संभव नहीं है क्योंकि कानून-व्यवस्था राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। अगर केंद्र सरकार कोई कदम उठाती है तो इसे संघीय प्रणाली पर हमला माना जाएगा, क्योंकि मणिपुर में कांग्रेस की सरकार है केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है।
जिरिबाम-तुपुल खंड में 112 छोटे पुल, 6 बड़े पुल, तीन सड़क पुल और दो भूमिगत सड़क पुल का निर्माण किया जाना है।
पहले चरण के दौरान 34 सुंरगों का निर्माण किया जाएगा जिसकी कुल लंबाई 39,401 मीटर होगी।
जिरिबाम-तुपुल खंड की सबसे लंबी सुरंग 4.9 किमोमीटर लंबी होगी जबकि तुपुल इंफाल खंड की सबसे लंबी सुरंग की लंबाई 10.75 किलोमीटर होगी।
रेलवे ने मोदी सरकार से कहा है कि तुपुल-इंफाल खंड (जिसकी लंबाई 27 किलोमीटर है) का काम निर्धारित समय सीमा मार्च 2018 तक पूरा नहीं हो सकेगा, क्योंकि परियोजना के पहले चरण (जिरिबाम-तुपुल खंड) में देरी हो रही है।
प्रधानमंत्री मोदी की योजना इस रेलवे लाइन को इंफाल से 109 किलोमीटर दूर मणिपुर-म्यांमार सीमा के मोरेह तक ले जाने की है। लेकिन, यह अभी दूर की कौड़ी लग रही है।
अर्थशास्त्री और पूर्वोत्तर के मामलों के विशेषज्ञ इंद्रनील भौमिक का कहना है, “वर्तमान गति से जो काम चल रहा है, उस हिसाब से यह परियोजना 2023 से पहले पूरी नहीं होगी। केंद्र और राज्य की सरकारों को इस बारे में जागना होगा। “
विद्रोही समूहों की ऐसी ही चुनौती का सामना त्रिपुरा को करना पड़ा था। लेकिन, त्रिपुरा की वाम मोर्चा सरकार ने इनके खिलाफ कड़े कदम उठाए। नतीजा यह हुआ कि अगरतला की रेल लाइन तैयार हो गई और अब इसे अखुआरा तक ले जाकर बांग्लादेश के रेलवे सिस्टम से जोड़ा जा चुका है।
dharmpath.com dharmpath