चेन्नई, 18 अप्रैल (आईएएनएस)। केंद्र सरकार को भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) में बहाली की उन शर्तो को हटा देना चाहिए, जिसमें ऋण डिफाल्टरों को लिपिक पद के लिए आवेदन करने के अयोग्य करार दिया गया है। यह बात मंगलवार को राजनीतिक पार्टी पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) के संस्थापक एस. रामदास ने कही।
रामदास ने यहां जारी एक बयान में कहा, “यह शर्त कि शिक्षा ऋण वापस नहीं चुकाने वाले नौकरी के लिए आवेदन नहीं कर सकते हैं, असंवैधानिक है।”
उन्होंने केंद्र सरकार से मामले में हस्तक्षेप कर यह सुनिश्चित करने की मांग की कि बहाली की इस शर्त को हटाया जाए।
एसबीआई ने लिपिक के 17,140 पदों पर भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं।
एसबीआई ने हालांकि ऐसे अभ्यर्थियों को आवेदन करने से मना कर दिया है, जिनका रिकार्ड ऋण नहीं चुकाने या क्रेडिट कार्ड बिल का भुगतान नहीं करने का है या जिनके नाम के विरुद्ध सिविल या अन्य एजेंसियों की प्रतिकूल रपट उपलब्ध है।
एसबीआई की सूचना में कहा गया है, “जिन अभ्यर्थियों के विरुद्ध चरित्र और पिछले जीवन तथा नैतिक व्यवहार के बारे में प्रतिकूल रपट उपलब्ध है, वे इस पद के लिए आवेदन करने के अयोग्य हैं।”
रामदास ने कहा कि ऐसी शर्त देश के युवाओं के रोजगार करने के अधिकार के विरुद्ध है और असंवैधानिक है।
उन्होंने कहा कि छात्र पढ़ाई करने के लिए शिक्षा ऋण लेते हैं और जिसकी वापसी नौकरी प्राप्त करने के बाद करनी होती है।
उन्होंने कहा कि आज रोजगार पाना कठिन है और एसबीआई द्वारा ऋण डिफाल्टरों को नौकरी के लिए आवेदन करने से वंचित करने का नकारात्मक परिणाम आएगा।
रामदास ने कहा कि शिक्षा ऋण लेने वाले 90 फीसदी लोग इसका वापस भुगतान कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, “राष्ट्रीयकृत बैंक दोहरा व्यवहार कर रहे हैं। बैंकों का कुल बुरा ऋण चार लाख करोड़ रुपये का हो गया है और बैंक उस पर कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।”
उन्होंने कहा कि यदि पीएमके तमिलनाडु में सत्ता में आती है, तो वह बकाया शिक्षा ऋण को माफ कर देगी।
बैंकिंग कर्मचारी संघों ने भी इन शर्तो का विरोध किया है।
ऑल इंडिया बैंक एंप्लाईज एसोसिएशन (एआईबीईए) के महासचिव सी.एच. वेंकटाचलम ने आईएएनएस से कहा, “एसबीआई की शर्त अनुचित है। इसे बदला जाना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था की हालत खराब है और कंपनियां ऋण नहीं चुका रही हैं।
वेंकटाचलम ने कहा, “नए स्नातकों को रोजगार नहीं मिल पा रहा है और बेरोजगारी बढ़ रही है।”
उन्होंने कहा, “यह विडंबना है कि विजय माल्या पर बैंकों का करीब 9,000 करोड़ रुपये बकाया है और उन्हें विलफुल डिफाल्टर घोषित किए जाने बाद भी वह सांसद बने हुए हैं। दूसरी ओर वाजिब कारणों से शिक्षा ऋण नहीं चुका पाने वाले को एसबीआई में लिपिक की नौकरी के लिए आवेदन करने से रोका जा रहा है।”
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