नई दिल्ली, 3 जून (आईएएनएस)। भले ही भारत दशकों बाद सबसे भयानक जल संकट से जूझ रहा है, 11 राज्यों के 266 जिले इसकी चपेट में हैं, लेकिन इसके बावजूद सरकार देश के जल स्रोतों का प्रबंधन करने में अदूरदर्शी बनी हुई है। गैरसरकारी संस्था ग्रीनपीस इंडिया ने विद्युत संयंत्रों के आंकड़ों का अध्ययन कर यह बात कही है।
ग्रीनपीस इंडिया ने गुरुवार को सात राज्यों महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तर-प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलगांना, व छत्तीसगढ़ में विद्युत संयंत्रों के द्वारा किए जा रहे पानी के इस्तेमाल पर आंकड़े जारी किए हैं। सिर्फ इन सात राज्यों में तापीय विद्युत संयंत्र इतना पानी इस्तेमाल कर लेते हैं, जितना एक साल में पांच करोड़ लोगों की मूलभूत जरूरतों के लिए काफी है।
मार्च में ग्रीनपीस इंडिया द्वारा जारी एक विश्लेषण में यह तथ्य सामने आया था कि प्रत्येक साल कोयला आधारित विद्युत संयंत्र भारत में 4.6 अरब घन मीटर जल का इस्तेमाल करते हैं। जल की यह मात्रा 5.1 करोड़ लोगों के मूलभूत पानी की जरुरत को पूरा करने में सक्षम है। अगर सभी प्रस्तावित विद्युत संयंत्र को बनाया जाता है, तो पानी की यह मात्रा कई गुना अधिक हो सकती है।
ग्रीनपीस कैंपेनर जयकृष्णा का कहना है, “हमारे देश के ज्यादातर जिले सूखे से प्रभावित हैं। इसके बावजूद भी हम कोयला आधारित विद्युत क्षेत्र द्वारा खपत किए जा रहे पानी की बड़ी मात्रा को नजरअंदाज कर रहे हैं। यहां तक कि सरकार सूखा प्रभावित इलाकों में भी कोयला आधारित विद्युत संयंत्र को बढ़ाने की योजना बना रही है। अगर लोगों की जीविका और आधारभूत जरूरतों के लिए पानी और कोयला आधारित विद्युत संयंत्र के लिए पानी के बीच में किसी को चुनना हो तो निश्चित रूप से आधारभूत जरूरतों के लिए पानी को चुनना होगा।”
ग्रीनपीस के विश्लेषण के अनुसार, अगर सभी सात राज्यों में प्रस्तावित विद्युत संयंत्र में खपत होने वाले जल को जोड़े तो संयंत्र में पानी की कुल खपत में तीन गुना वृद्धि हो जाएगी।
जयकृष्णा कहते हैं, “यह वृद्धि अगली बार कम बारिश होने पर घी में तेल डालने का काम कर सकता है और जल संकट बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।”
उनका कहना है कि 2016 में जारी जल-संकट ने भारत को मौका दिया है जब वो कोयला आधारित ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम करके अक्षय ऊर्जा के दूसरे स्वच्छ स्रोतों की तरफ ध्यान दे। कोयला की तुलना में सौर और पवन ऊर्जा में पानी की खपत न के बराबर है।
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