नई दिल्ली, 23 जून (आईएएनएस)। भारत ने गुरुवार को मीडिया के इस आरोप का सख्ती से खंडन किया कि देहरादून स्थित एक शोध केंद्र ने हो सकता है, उत्तर कोरिया के विशेषज्ञों को प्रशिक्षण देकर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों का उल्लंघन किया हो।

वे विशेषज्ञ इस अलग-थलग पड़े साम्यवादी देश में गोपनीय सैन्य कार्यक्रम के महत्वपूर्ण पद पर हैं।

वे विशेषज्ञ इस अलग-थलग पड़े साम्यवादी देश में गोपनीय सैन्य कार्यक्रम के महत्वपूर्ण पद पर हैं।

यह आरोप अल-जजीरा के एक लेख के बाद लगा है। उसने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक रिपोर्ट के हवाले से कहा है कि सेंटर फॉर स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी एजुकेशन इन एशिया एंड पेसिफिक (सीएसएसटीईएपी) ने पिछले करीब 20 वर्षों में कम से कम उत्तर कोरिया के 30 लोगों को प्रशिक्षण दिया है।

प्रशिक्षित उत्तर कोरियाई लोगों में पेइक चांग हो भी हैं। हो को वर्ष 2012 के 12 दिसंबर को उन्हा-3 रॉकेट के प्रक्षेपण के लिए प्राधिकृत किया गया था। यह बात संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की वर्ष 2016 की रिपोर्ट में कही गई है। बताया जाता है कि पेइक उत्तर कोरिया के नेशनल एयरोस्पेस डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन के के वैज्ञानिक अनुसंधान एवं विकास विभाग के उप निदेशक हैं।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल इस केंद्र में दो छात्र ऐसे हैं जो वहां अध्ययन कर रहे हैं। इनमें से एक उत्तर कोरिया के नेशनल एयरोस्पेस डेवलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन से जुड़ा है। यह उत्तर कोरिया के परमाणु विकास कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

लेकिन भारत ने इस बात से इनकार किया है कि इस संस्थान ने ऐसे पाठ्यक्रम संचालित किए हैं, जिनसे उत्तर कोरियाई छात्रों को परमाणु से संबंधित प्रशिक्षण या हस्तांतरण, बैलिस्टिक मिसाइल से जुड़ा या व्यापक विनाश से जुड़े अन्य हथियार कार्यक्रम में सहायता मिल सकती है जैसा कि अल-जजीरा के लेख में आरोप लगाया गया है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने एक बयान में कहा, “हम लोगों ने उस लेख को देखा। उस लेख में भारत की उत्तर कोरिया को संयुक्त राष्ट्र से वर्जित गतिविधियों में सहायता करने के बारे में जो परोक्ष संकेत किया गया है, वह आधारहीन है और उसका कोई महत्व नहीं है।”

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि एक पाठ्यक्रम में ऐसी जानकारी दी गई कि जो सीधे तौर पर बैलिस्टिक मिसाइल प्रौद्यौगिकी में इस्तेमाल किए जाने वाले प्रक्षेपण यान की डिजाइन व परीक्षण में प्रासंगिक हो सकती है। जैसा कि प्रक्षेपण यान पर स्थिति नियंत्रण और दूरमापी, नजर रखने, नियंत्रण और डाटा हैडलिंग प्रणाली आदि।

स्वरूप ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट आत्मपरक और जिन्होंने इसे लिखा है उन विशेषज्ञों की सीमित समझ का परिणाम है।

प्रवक्ता ने कहा, “भारत ने अपनी स्थिति इस बारे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्पष्ट कर दिया है। सीएसएसटीईएपी के पाठ्यक्रमों में जिन प्रसंगों को पढ़ाया जाता है वास्तव में वे बहुत सामान्य होते हैं और वे संबंधित क्षेत्र की बुनियादी सिद्धांतों को कवर करते हैं।”

संयुक्त राष्ट्र प्रायोजित इस केंद्र की स्थापना वर्ष 1995 में की गई थी। इस यह सुनिश्चित करना था कि इस क्षेत्र के किसी भी देश को अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग में विशेषज्ञता के लिए विदेश की ओर नहीं देखना पड़ा।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह केंद्र जो पाठ्यक्रम पेश करता है उसे जानबूझकर बैलिस्टिक मिसाइल विकसित करने में सहायता करने के लिए नहीं बनाया गया है लेकिन विशेषज्ञ कमेटी का आकलन है कि इसके कुछ खास हिस्से या उन हिस्से के भी कुछ खास हिस्से में विशेषज्ञा वाला प्रशिक्षण शामिल है जिनका इस्तेमाल उत्तर कोरिया अपनी प्रतिबंधित गतिविधियों में कर सकता है।

अंतरिक्ष एवं वायुमंडलीय विज्ञान एवं वैश्विक नेविगेशन उपग्रह प्रणाली पाठ्यक्रम एक बैलेस्टिक मिसाइल से जुड़ी गतिविधि है जो उत्तर कोरिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध संकल्प के तहत प्रतिबंधित है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में जो कहा गया है, उसका खंडन करते हुए कहा, हम समझते हैं कि ये पाठ्यक्रम किसी भी तरह से संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न प्रतिबंधों का किसी भी तरह से उल्लंघन में योगदान नहीं करते।

उन्होंने कहा कि यूएन ऑफिर फॉर आउटर स्पेस अफेयर्स (यूएन-ओओएसए) का एक प्रतिनिधि संस्थान के संचालन परिषद एवं इसकी सलाहकार समिति का स्थाई पर्यवेक्षक होता है जो इसके पाठ्यक्रम का मूल्यांकन करती है और उम्मीदवारों के चयन का मानदंड तय करती है। इसकी अध्यक्षता भी यूएन-ओओएसए के निदेशक करते हैं।

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