अमरेली – गुजरात के अमरेली जिले की सावरकुंडला तहसील में बसा छोटा सा गांव जीरा अब पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है. वजह है गांव के मूल निवासी और सूरत में डायमंड कारोबारी बाबूभाई चोडवाड़िया उर्फ बाबूभाई जीरावाला का वह अनोखा कदम. बाबूभाई ने 290 से 300 किसानों के सिर से 30 साल पुराना कर्ज का बोझ हमेशा के लिए उतार दिया. कुल ₹89,89,209 (लगभग 90 लाख रुपये) की यह राशि बाबूभाई ने अपनी दिवंगत मां कांताबेन की पुण्यतिथि (2 नवंबर 2025) पर दान की, ताकि उनकी मां की अंतिम इच्छा पूरी हो सके.
साल 1995 में जीरा गांव की जीरा सेवा सहकारी मंडली बंद हो गई थी. मंडली के तत्कालीन प्रशासकों ने किसानों के नाम पर फर्जी ऋण उठाए. ये ऋण कभी चुकाए नहीं गए, इसलिए ब्याज सहित राशि 7 से 12 गुना तक बढ़ गई. जिसकी वजह से गांव के सैकड़ों किसान बैंकों से नया लोन नहीं ले पाते थे. खेती-किसानी के लिए जरूरी उधार बंद हो गया था. कई परिवारों पर मानसिक और आर्थिक बोझ इतना बढ़ा कि वे नए अवसरों से वंचित हो गए. ये पुराने लोन मुख्य रूप से बैंक ऑफ बड़ौदा और सहकारी बैंक से जुड़े थे.
बाबूभाई जीरावाला सूरत में सफल डायमंड व्यापारी हैं. गांव से दूर रहते हुए भी उन्होंने अपनी मां कांताबेन की पुण्यतिथि को हर साल याद रखा. मां की इच्छा थी कि गांव के किसान कर्ज के बोझ से मुक्त हों. बाबूभाई और उनके भाईयों ने बैंक अधिकारियों से संपर्क किया. बैंक ने सहयोग किया और पूरी राशि एकमुश्त जमा करने पर No Dues Certificate (NDC) जारी करने का वादा किया. 2 नवंबर 2025 को बाबूभाई ने खुद बैंक में पूरी राशि जमा कराई.
3 नवंबर 2025 को जीरा गांव में भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ. हर किसान को हाथों में कर्जमुक्ति प्रमाणपत्र थमाया गया. कई बुजुर्ग किसानों की आंखों में आंसू थे. 30 साल बाद पहली बार वे “कर्जमुक्त” हुए. किसानों ने बाबूभाई को आशीर्वाद दिया और गांव में मिठाइयां बांटी गईं.
किसान अब बिना किसी पुराने बोझ के बैंक से नया कृषि ऋण ले सकेंगे. खरीफ और रबी फसल के लिए बीज, खाद, मशीनरी आसानी से मिलेगी. जीरा अब “कर्जमुक्त गांव” के रूप में जाना जाएगा. युवा पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी कि परोपकार से समाज बदल सकता है.
बाबूभाई ने कहा, “मां की पुण्यतिथि पर इससे बेहतर श्रद्धांजलि और क्या हो सकती थी? यह पैसा नहीं, बल्कि गांव की खुशी है.” सोशल मीडिया पर #JiraDebtFree और #BabubhaiJirawala ट्रेंड कर रहा है.
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