मुंबई, 23 नवंबर (आईएएनएस)। तमिलनाडु स्थित कांचीपुरम मठ (कांची कामकोटि पीठ) के प्रमुख (शंकराचार्य)श्री जयेंद्र सरस्वती ने सरकार द्वारा स्वीकृत आदि शंकराचार्य के जन्म वर्ष को “गलतबयानी” करार दिया है।
जयेंद्र सरस्वती ने कहा, “पूरे प्रस्ताव में जो एक विरूपण है, वह आदि शंकराचार्य के जन्म वर्ष को लेकर की गई गलतबयानी है। यह किया-धरा पश्चिमी जगत के लोगों का है, जो ईसा मसीह के जन्म के बाद अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए ऐसे महत्वपूर्ण मामलों में ऐसी मिथ्या प्रस्तुति करते रहते हैं।”
अपने निकट सहयोगी बी.श्रीधर के जरिए संवाद के दौरान उन्होंने कहा कि कांची मठ के साथ ही द्वारका, श्रंगेरी, पुरी और बद्री के मठों का भी यही कहना है कि आदि शंकराचार्य का जन्म 788 ईस्वी (एडी) में नहीं, बल्कि ईसा पूर्व 509 में हुआ था।
ईसा पूर्व युग में आदि शंकराचार्य के जन्म के अपने सिद्धांत के समर्थन में उन्होंने दो प्रमाण पेश किए। एक तो यह कि सभी चार मठों के 70 से अधिक शंकरार्चा हो चुके हैं और दूसरा यह कि कार्बन डेटिंग से पता चला है कि केरल में कालादि नदी लगभग 2500 साल पहले ही बहनी शुरू हुई थी।
उन्होंने कहा कि यह दूसरा बिंदु इस मान्यता के अनुरूप है कि आदि शंकराचार्य ने नदी को अपने जन्मस्थान कालादि में बहने के लिए मनाया था, ताकि उनकी मां को नदी में स्नान के लिए चलकर दूर न जाना पड़े।
नौ दिन की यात्रा पर मुंबई पहुंचे कांची मठ प्रमुख ने अगले साल से आदि शंकराचार्य की जयंती को ‘दार्शनिक दिवस’ के रूप में मनाने के सरकार के फैसले का स्वागत किया।
उन्होंने कहा, “आदि शंकराचार्य भारत ेके सर्वाधिक विद्वान दार्शनिक थे, जिन्होंने अद्वैत के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। यही अंतत: सभी दर्शनों का आधार बना। उन्होंने बिखरे हुए हिंदूवाद को एक किया और वह पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत को एक इकाई बताया था।”
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