आर्थिक सर्वेक्षण : विकास दर में वृद्धि के लिए सुधार पर बल (राउंडअप)

नई दिल्ली, 26 फरवरी (आईएएनएस)। संसद पटल पर शुक्रवार को पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 के मुताबिक आगामी वित्त वर्ष में विकास दर 7-7.75 फीसदी के दायरे में रहेगी। इसमें हालांकि चेतावनी भी दी गई है कि आगामी बजट को असामान्य चुनौतियों और कमजोर वैश्विक आर्थिक स्थिति से भी निपटना होगा।

आर्थिक सर्वेक्षण को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद के पटल पर रखा। इसमें वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू न हो पाने, विनिवेश लक्ष्य हासिल नहीं हो पाने और सब्सिडी प्रणाली को लेकर चिंता जताई गई है।

सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि बैंकों का बैलेंस शीट दबाव में है, जो निजी निवेश के लिए एक बड़ी बाधा बन रहा है और लंबी अवधि में देश की विकास दर 8-10 फीसदी रह सकती है।

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम द्वारा तैयार किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है, “सर्वेक्षण कमजोर वैश्विक आर्थिक स्थिति के बड़े जोखिम की पृष्ठभूमि में पेश किया गया है।”

सर्वेक्षण के मुताबिक, “भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाना स्वाभाविक जरूरत है। एक अन्य जरूरत उम्मीदों को पुनर्परिभाषित करने की है।” सर्वेक्षण में चेतावनी दी गई है कि यदि दुनिया संकट में पड़ेगी, तो भारत की विकास दर भी प्रभावित होगी।

सर्वेक्षण में सकारात्मक रूप से कहा गया है कि भारत सबसे तेज विकास दर वाली बड़ी अर्थव्यवस्था और स्थिरता का पनाहगाह तथा अवसरों की भूमि बना रहेगा। इसमें साथ ही कहा गया है कि स्थिर कराधान, व्यापार की सुविधा और विदेशी सहभागिता के लिए उठाए गए कदमों को दुनियाभर में स्वीकृति मिली है।

सर्वेक्षण के मुताबिक 2016-17 में उपभोक्ता महंगाई दर 4.5-5 फीसदी के दायरे में रहेगी।

सर्वेक्षण में कई नीतिगत सुझाव भी दिए गए हैं। जैसे कि कंपनियों और खासकर स्टार्ट-अप कंपनियों को बंद करने के लिए उतने ही सरल नियम होने चाहिए, जितने सरल नियम कंपनी खोलने के बारे में हैं। इससे निवेश, रोजगार सृजन और विकास की बाधाएं दूर होंगी। इसमें कृषि पर भी ध्यान देने की बात की गई है। साथ ही इसमें स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मानवीय जरूरतों पर भी ध्यान देने की बात की गई है, ताकि जनसांख्यिकी लाभांश हासिल किया जा सके।

सर्वेक्षण में कहा गया है, “भारत कृषि को नजरंदाज नहीं कर सकता है। आखिरकार करीब 42 फीसदी भारतीय परिवारों की आय का यह एक प्रमुख साधन है।”

वित्तीय घाटा के बारे में सर्वेक्षण में कहा गया कि मौजूदा कारोबारी साल में 3.9 फीसदी वित्तीय घाटा का लक्ष्य हासिल हो जाएगा। इसमें हालांकि आगामी साल को चुनौतीपूर्ण बताते हुए कर अनुपालन बेहतर करने, आय के नए साधन जुटाने, खर्च की समीक्षा करने और सब्सिडी में सुधार करने पर ध्यान देने का सुझाव दिया गया है।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि अभी आय अर्जित करने वाले सिर्फ 5.5 फीसदी लोग आय कर के दायरे में आते हैं, जिसे बढ़ाकर 20 फीसदी तक पहुंचाया जाना चाहिए।

सर्वेक्षण के मुताबिक तमाम अनिश्चितता और अस्थिरता के बीच भी भारतीय शेयर बाजार अन्य उभरते बाजारों के शेयर बाजारों के मुकाबले गिरावट से उबरने में अधिक सक्षम है। साथ ही मजबूत आर्थिक बुनियाद के कारण देश भारत में अग्रणी निवेश गंतव्य बनने की प्रबल संभावना है।

सर्वेक्षण के मुताबिक नीति निर्माण में तेजी लाने और लोकसेवकों में फैसला लेने का साहस पैदा करने के लिए और भी काफी कुछ किए जाने की जरूरत है। अभी वैधानिक प्रावधान काफी कठोर हैं और भ्रष्टाचार निरोधी कानून भ्रष्टाचारियों को डराने की बजाए ईमानदारों को ही डराते हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है, “लोक सेवा और अन्य क्षेत्रों में यह आम धारणा बन गई है कि हाल के दिनों में लोकसेवक तेजी से और मजबूती से फैसला लेने से कतरा रहे हैं।”

सामाजिक पहलुओं के बारे में कहा गया है भारत में अभी भी कुपोषित लोगों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है और इस पर शीघ्रता से ध्यान देने की जरूरत है। देश में 42 फीसदी से अधिक गर्भवती महिलाओं का वजन कम होता है।

सर्वेक्षण के मुताबिक, “हाल में हुए विकास के बावजूद जच्चा और बच्चा स्वास्थ्य संकेतकों पर प्रदर्शन निराशाजनक है। भारत ने जनसांख्यिकी लाभांश का आधा ही लाभ उठाया है। पूरो लाभ उठाने के लिए स्वास्थ्य और शिक्षित आबादी की जरूरत है।”

सुब्रह्मण्यम ने सर्वेक्षण में इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि ऐसी नीति बनाने की जरूरत है, जो भारतीयों को बेहतर, समृद्ध और स्वस्थ्य बनाए।

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