भुवनेश्वर, 24 जनवरी (आईएएनएस)। ओडिशा सरकार फरवरी के प्रथम हफ्ते से राज्य में बाघों की गिनती करने जा रही है। लेकिन, इस कवायद पर नक्सलियों के खौफ की छाया मंडरा रही है। ऐसा माना जा रहा है कि अधिकारी बाघों की गिनती के लिए शायद ही सुनबेड़ा वन्यजीव अभयारण्य पहुंचें। बीते कुछ सालों में यह अभयारण्य नक्सलियों के गढ़ के रूप में उभर कर सामने आया है।
भुवनेश्वर, 24 जनवरी (आईएएनएस)। ओडिशा सरकार फरवरी के प्रथम हफ्ते से राज्य में बाघों की गिनती करने जा रही है। लेकिन, इस कवायद पर नक्सलियों के खौफ की छाया मंडरा रही है। ऐसा माना जा रहा है कि अधिकारी बाघों की गिनती के लिए शायद ही सुनबेड़ा वन्यजीव अभयारण्य पहुंचें। बीते कुछ सालों में यह अभयारण्य नक्सलियों के गढ़ के रूप में उभर कर सामने आया है।
2004 में नुआपाड़ा जिले के इस अभयारण्य के लाल गलियारे (रेड कारिडोर) का हिस्सा बनने के बाद से यहां पर बाघों की गणना नहीं की गई है। केंद्र ने इस अभयारण्य को 2014 में सैद्धांतिक रूप से बाघ संरक्षित क्षेत्र घोषित किया था। 600 वर्ग किलोमीटर में फैले इस अभयारण्य से वन्यजीव प्रेमी और पर्यटक नक्सलियों के डर से दूर रहते हैं। नक्सली अभयारण्य के अंदर और आस-पास के इलाकों में कई वन रक्षक और पुलिस अधिकारियों की हत्या कर चुके हैं।
सरकार को उम्मीद है कि नक्सली खतरे से निपटने के लिए अभयारण्य में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की वजह से इस बार यहां बाघों की गणना हो सकेगी।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वाइल्डलाइफ) एस.एस. श्रीवास्तव ने आईएएनएस से कहा, “हम इस बार बाघों की गिनती को लेकर आशान्वित हैं। पुलिस के अलावा केंद्रीय बल भी तैनात हैं। अगर कोई अनचाही घटना हुई तो हम गिनती छोड़ देंगे। लेकिन, आज की तारीख में यह तय है कि हम गिनती करने जा रहे हैं।”
2004 की गणना के मुताबिक, सुनबेड़ा में 32 बाघ और 36 तेंदुए थे। इनकी आज की संख्या के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि 2004 के बाद यहां इनकी गणना नहीं की जा सकी है।
अधिकारियों ने इस बात को माना कि नक्सलियों के डर की वजह से बाघों-तेंदुओं के लिए आवंटित धन का इस्तेमाल इन पर नहीं हो पा रहा है।
नक्सलियों की यहां मौजूदगी 2008 में दर्ज की गई। इन्होंने अभयारण्य में पहली बड़ी वारदात मई 2012 में की थी, जब इनके हमले में नौ पुलिसकर्मी मारे गए थे।
नक्सलियों की गतिविधियां बढ़ने के बाद अभयारण्य आने वाले पर्यटकों की संख्या में तेजी से गिरावट दर्ज की गई। हालत यह है कि 2012 के बाद से यहां एक भी पर्यटक नहीं आया है।
टाइगर अनुमान रपट-2014 में कहा गया है कि ओडिशा में बाघों की संख्या 28 ही है। लेकिन, ओडिशा का वन विभाग इसे मानने के लिए तैयार नहीं है। विभाग का अनुमान है कि राज्य में 60 बाघ हो सकते हैं।
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