दरअसल फेसबुक में पोस्ट के बाद सरकार ने वर्षा डोंगरे को बिना अनुमति छुट्टी पर जाने की वजह से उन्हें कारण बताओ नोटिस देकर निलंबित कर दिया था, जिसका जवाब वर्षा ने 370 से अधिक पन्नों में दिया था। इसके बाद वर्षा ने अंबिकापुर जेल में आमद दी और वह 15 दिन की छुट्टी पर चली गईं।
स्वामी अग्निवेश ने पत्र में लिखा है कि वर्षा डोंगरे के उठाए गए मुद्दे के बाद सरकार के व्यवहार को लेकर पत्र लिखने की जरूरत पड़ी है।
अग्निवेश ने पत्र में लिखा है, “मुझे आपको यह पत्र लिखने की प्रेरणा सहायक जेलर वर्षा डोंगरे द्वारा उठाए गए मुद्दे और फिर वर्षा डोंगरे के साथ किए जा रहे छत्तीसगढ़ सरकार के व्यवहार से मिली है।”
उन्होंने लिखा है, “वर्षा डोंगरे जगदलपुर जेल में भी काम कर चुकी हैं। जगदलपुर में अपने काम के दौरान वर्षा डोंगरे ने जेल में नाबालिग लड़कियों को पुलिस द्वारा जेल में लाकर बंद किए जाते देखा। वर्षा डोंगरे ने यह भी देखा कि इन छोटी-छोटी आदिवासी लड़कियों के स्तनों और कलाइयों पर बिजली से जलाए जाने के निशान थे, जो पुलिस के कर्मचारियों द्वारा उन्हें थाने में लगाए गए थे।”
पत्र के अनुसार, “हम सभी जानते हैं कि भारत में पुलिस द्वारा थानों में थर्ड डिग्री एक हकीकत है। लेकिन आपके राज्य छत्तीसगढ़ में जो कि मेरा भी राज्य है, वहां इसे रोकने की कोशिश तो हम लोगों को मिल कर करनी ही चाहिए। ऐसे में जब एक महिला जेल अधिकारी पूरी हिम्मत के साथ हम सब का ध्यान इस भयानक स्थिति की तरफ दिला रही है तो हमें उस महिला अधिकारी का धन्यवाद देना चाहिए और इस बुराई को समाप्त करने के लिए प्रशासनिक कदम उठाने चाहिए। लेकिन दु:ख की बात यह है कि इस हिम्मती दलित महिला अधिकारी की हिम्मत बढाने की बजाय निलम्बित किया गया और आपकी सरकार के गृहमंत्री ने इस हिम्मती महिला के शहरी माओवादी होने की भी टिप्पणी कर दी।”
अग्निवेश ने आगे लिखा है, “मुझे याद है माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जब सलवा जुडूम के मामले में आदेश दिया गया था तब भी छत्तीसगढ़ के तत्कालीन गृहमंत्री ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के माओवादी समर्थक होने का बयान दिया था। सुकमा के दलित न्यायाधीश प्रभाकर ग्वाल को भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने पर बर्खास्त कर दिया गया। मुझे लगता है इस तरह हम अगर हरेक आलोचक को माओवादी कह कर खारिज करते जाएंगे तो फिर सरकार को यह कैसे पता चलेगा कि सरकार से क्या गलतियां हो रही हैं?”
अग्निवेश ने लिखा है, “अगर सरकार न्याय की बात करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों, पत्रकारों, को न्याय के लिए कोशिश करने की वजह से माओवादी घोषित करके उनको जेलों में डाल देंगे या उन्हें छत्तीसगढ़ से बाहर भगा देंगे तो फिर कोई भी न्याय और शांति के लिए आवाज उठाने में डरेगा।”
उन्होंने लिखा है, “वर्षा डोंगरे एक लोक सेवक है। लोक सेवक का कर्तव्य संविधान, कानून और जनता के हित में काम करना है। लोक सेवक किसी पार्टी या किसी सरकार का समर्थक नहीं होता। वर्षा डोंगरे ने प्रदेश की जनता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाई है। वर्षा डोंगरे का निलंबन सरकार की छवि तो धूमिल करेगा ही, साथ ही सरकार का यह कदम छत्तीसगढ़ में शांति स्थापना की सरकार की घोषणा पर भी शक पैदा करेगा।”
उन्होंने अंत में लिखा है, “मैं इस पत्र के माध्यम से आपसे अपील करता हूं कि आप इस मामले में हस्तक्षेप करें और वर्षा डोंगरे का निलंबन रद्द कर उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों पर एक जांच दल गठित करें। यदि छत्तीसगढ़ में शांति स्थापना में आप हमारी किसी सेवा की जरूरत महसूस करें तो हम उसके लिए सदैव तत्पर हैं।”
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