नई दिल्ली, 10 अगस्त (आईएएनएस)। दिल्ली की एक अदालत ने बुधवार को 2011 में दिल्ली उच्च न्यायालय में हुए विस्फोट के मामले में एक नाबालिग को तीन साल सुधार गृह में रखने का किशोर न्याय बोर्ड का आदेश बरकरार रखा है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश राकेश पंडित ने किशोर न्याय बोर्ड का नौ जुलाई, 2014 का आदेश बरकरार रखा है।
यहां सात सितंबर, 2011 को अदालत परिसर के गेट नम्बर पांच के बाहर हुए विस्फोट में कम से कम 15 लोगों की मौत हो गई थी और 79 घायल हो गए थे।
सत्र अदालत ने नाबालिग को भारतीय दंड संहिता की धारा 121 (देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने) के साथ धारा 120-बी (आपराधिक साजिश), 121ए (युद्ध छेड़ने के लिए प्रतिबद्ध करने की साजिश), 122 (युद्ध छेड़ने के लिए हथियार इकठ्ठा करने), 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 323 (जान बूझकर चोट पहुंचाना), 325 (जानबूझकर गंभीर चोट पहुंचाना), 436 (विस्फोटक पदार्थ के जरिए नुकसान), 440 (हत्या के उपक्रम करना) और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी पाया।
लेकिन अदालत ने उसे गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियमों से संबंधित अरोपों से बरी कर दिया।
बोर्ड ने किशोर को देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने के साथ आपराधिक साजिश, हत्या, हत्या का प्रयास, जान बूझकर चोट पहुंचाने और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के प्रावधानों की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी पाया था।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का दावा है कि किशोर ने मीडिया संस्थानों को विस्फोट की जिम्मेदारी का दावा करता एक ईमेल भेजा था और साथ ही संसद भवन हमले के प्रमुख आरोपी अफजल गुरु को फांसी पर लटकाए जाने की स्थिति में अन्य अदालतों में भी बम विस्फोट करने की धमकी दी थी।
एनआईए के मुताबिक, “किशोर ने वह ईमेल जम्मू एवं कश्मीर के किश्तवाड़ से भेजा था।”
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