नई दिल्ली, 20 मई (आईएएनएस)। सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक आपराधिक मामले में हिंदी के एक न्यायिक आदेश का गलत अंग्रेजी अनुवाद के लिए याचिकाकर्ता पर 25000 रुपये लागत थोप दिया।
न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अवकाशकालीन पीठ ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि 24 घंटे के भीतर इस राशि को कानूनी सेवा प्राधिकरण के पास जमा कराया जाए, और ऐसा न होने पर लागत राशि लगातार बढ़ती जाएगी।
नाराज न्यायाधीशों ने कहा कि उन्हें इस आदेश को समझने में एक घंटे मशक्कत करनी पड़ी और उन्होंने इसके पहले इस तरह का आदेश नहीं देखा था, जिसमें ग्रामर की इतनी गलती और अन्य गलतियां रही हों।
याचिकाकर्ता वर्धा राम की ओर से पेश हुईं अधिवक्ता ऐश्वर्य भाटी ने पीठ से कहा कि उच्च न्यायालय के जिस आदेश में न्यायालय ने ग्रामर की गलतियां देखी हैं, वह वाकई में हिंदी में दिए गए मूल आदेश के गलत अंग्रेजी अनुवाद के कारण हैं। इसके बाद न्यायालय ने यह लागत राशि जमा करने का आदेश याचिकाकर्ता को दिया।
प्रारंभ में सर्वोच्च न्यायालय ने समझा कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने ही अंग्रेजी में गलत आदेश पारित किया है, जिसमें ग्रामर, वाक्य विन्याश, शब्दों के प्रयोग और अन्य तरह की गलतियां थीं। न्यायालय ने एक नए आदेश के लिए इस आदेश को वापस उच्च न्यायालय भेज दिया।
लेकिन जब भाटी ने स्वीकार किया कि उच्च न्यायालय के आधिकारिक अनुवादक ने अनुवाद में गलती की है, तो पीठ ने अपना आदेश बदल दिया और यह लागत राशि याचिकाकर्ता पर थोप दिया।
न्यायालय ने वकील से कहा, “आपको इसका अनुवाद खुद देखना चाहिए था।”
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