बिहार के किसानों को इंद्र देवता की मेहरबानी का इंतजार

इमरान खान

इमरान खान

शिवनगर (बिहार), 2 जुलाई (आईएएनएस)। ‘बरसेगा?’ या ‘नहीं बरसेगा?’ इन्हीं दो सवालों के साथ किसान दिनेश कुमार व महेंद्र राय की आंखें गाहे-बगाहे आसमान की तरफ उठ जाती हैं। हर दिन उन्हें इंतजार रहता है कि आज इंद्र देवता मेहरबान होंगे।

वे अकेले नहीं हैं। बिहार में हजारों-लाखों किसानों की निगाहें बीते एक हफ्ते से आसमान पर टिकी हुईं हैं। बादल आते तो हैं, लेकिन एक-आध बूंद टपका कर चले जाते हैं।

बिहार में मानसून के पहुंचने की तारीख आम तौर से 12 से 14 जून के बीच मानी जाती है। लेकिन, जून खत्म हो गया और यह नहीं पहुंचा। इससे राज्य में कम बारिश और सूखे का खतरा पैदा हो गया है।

दिनेश और महेंद्र गया जिले के टेकारी ब्लॉक की शिवनगर पंचायत के रहने वाले हैं। उन्हें उम्मीद है कि बीते साल की ही तरह इस बार भी मानसून सामान्य रहेगा और उनकी धान की उपज फिर अच्छी होगी।

सीमांत किसान दिनेश ने कहा, “बारिश न होने की वजह से मुझ जैसे किसान काफी दिक्कत झेल रहे हैं। हमारे पास मानसून पर निर्भर रहने के अलावा और कोई चारा नहीं है। देखिए..जमीन में दरार नजर आने लगी है। अगर यही हाल जुलाई के पहले हफ्ते तक रहा तो फिर हम धान की पूरी बुवाई नहीं कर सकेंगे।”

राज्य में मानसून की खराब दशा को देखते हुए कृषि विभाग ने जिलों को पहले ही अलर्ट कर दिया है और अधिकारियों से उन फसलों की तैयारी करने के लिए कहा है जिनमें कम पानी की जरूरत पड़ती है।

विभाग ने सूखे जैसी किसी हालत से निपटने के लिए आपात योजना के तहत 90 करोड़ रुपये दिए हैं जिनसे किसानों को रियायती दर पर डीजल उपलब्ध कराया जाएगा।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुक्रवार को पटना में अपने सरकारी आवास से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए जिलों को अधिकारियों से संवाद किया और सूखे जैसी स्थिति से निपटने के लिए उनकी तैयारियों के बारे में पूछा।

कृषि विभाग और कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि नवादा और जहानाबाद जिलों को छोड़कर राज्य के बाकी सभी जिले कम बारिश से प्रभावित हैं। 38 में से 36 जिलों में धान की बुवाई प्रभावित हुई है।

नौ जिले सर्वाधिक प्रभावित हैं। इनमें गया, बक्सर, भागलपुर, नवादा शामिल हैं। इन नौ जिलों में 60 से 83 फीसदी कम बारिश हुई है। बाकी 27 जिलों में 20 से 59 फीसदी कम बारिश हुई है।

एक अधिकारी ने बताया कि जितने क्षेत्र में धान की बुवाई का लक्ष्य था, उसमें से आधे में ही बुवाई हो सकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि धान की बुवाई का काम 15 जुलाई तक हो जाना चाहिए, नहीं तो इनकी गुणवत्ता और उत्पादन पर असर पड़ेगा।

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