झांसी, 26 फरवरी (आईएएनएस)। बुंदेलखंड का किसान समस्याओं के भंवर जाल में उलझा है। सूखा भयावह रूप लेता जा रहा है, पलायन जारी है, आत्महत्या किसानों के लिए आम हो चला है। हर किसान दर्द से कराह रहा है। झांसी में शुक्रवार को सम्पन्न हुए दो दिवसीय ‘बुंदेलखंड की पारिस्थितिकीय और अर्थव्यवस्था पुर्नजीवन कार्यशाला’ में किसानों का दर्द खुलकर सामने आया।
ललितपुर के तालबेहट के अमृत पाल झावर ने कहा कि उनके खेतों में एक दाना भी उगने की संभावना नहीं है, क्योंकि सिंचाई के लिए पानी नहीं मिला। उन्हें लग रहा है कि आगे आने वाला समय उनका कैसे कटेगा।
उन्होंने कहा कि सरकार ने हर भूखे का पेट भरने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून तो लागू कर दिया है, मगर उसका लाभ जनता को सही ढंग से नहीं मिल पा रहा है।
कार्यशाला में आए टीकमगढ़ के बनगांय के गंगाराम ने बताया कि उन्होंने “साथियों के साथ मिलकर चंदेलकालीन तालाब को नया जीव दिया, लेकिन अब वह तालाब भी सूख चला है। गांव में पीने का पानी नहीं है, रोजगार का अभाव है, परिणामस्वरुप लोग पलायन कर गए हैं। प्रकृति की मार झेलते लोगों को अब आस सिर्फ सरकार और समाज से है।”
स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने बुंदेलखंड की स्थिति को भयावह बताया। उन्होंने कहा, “किसान का मनोबल अब भी बना हुआ है। वह विपरीत स्थिति व सूखे का मुकाबला करने को तैयार है। इस क्षेत्र के सूखे से निपटने में सरकारी संस्थानों को अपनी भूमिका बढ़ाना होगी। यहां की सुखाड़ मुक्ति के लिए नदियों में मोड़ कुंड बनाकर धरती के पेट में पानी डालें। यहां बरसने वाले पानी की एक-एक बूंद सहेज कर रखें, ताकि बुरे दौर से दोबारा न जूझना पड़े।”
प्रयोगधर्मी बांदा के किसान प्रेम सिंह ने कहा कि “छोटे किसानों को बचाना होगा। बुंदेलखंड में ऐसी खेती हो जो जलवायु अनुकूल हो। खेतों की मिट्टी में नमी बढ़ानी होगी, हर किसान को अपनी एक-तिहाई जमीन में बाग लगाना होगा।”
महाराष्ट्र के सांगली जिले से आए परिवहन अधिकारी राजेंद्र बाबू मदने ने कहा कि उन्होंने जिस तरह से अपने जिले में अग्रणी नदी को जिंदा किया है, उस नदी पुर्नजीवन के प्रयोग को बुंदेलखंड में भी दोहराया जा सकता है। उनका मानना है कि संकट जितना गहरा हेाता है, प्रयास उतना गहरा होता है।
इस मौके पर रामकृष्ण शुक्ला ने सरकारों के रवैए और इस क्षेत्र के खिलाफ रची जा रही साजिश पर चिंता जताई।
कार्यशाला में जल-जन जोड़ो के संयोजक संजय सिंह ने कहा कि “बुंदेलखंड के किसानों के दर्द को सरकारें गंभीरता से लें। अगर सरकार के साथ समाज भी किसानों की मदद के लिए आगे आए तो यहां का किसान विषम स्थिति से निपटने में सक्षम है।”
बुंदेलखंड में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुल 13 जिले आते हैं और लगभग सभी जिलों की कमोवेश एक जैसी स्थिति है। खेत वीरान हैं, कुओं में पानी नहीं है, तालाब सूख चुके हैं और नौजवान पीढ़ी का बड़ा हिस्सा रोजगार की तलाश में दूर जा चुका है। मवेशियों के लिए चारा-पानी का संकट है, जिसके चलते किसानों ने उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया है।
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