अगरतला, 18 दिसम्बर (आईएएनएस)। पूर्वोत्तर में बौद्ध धर्म से जुड़ी धरोहरों पर तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन शुक्रवार को यहां शुरू हुआ।
सम्मेलन का मकसद धरोहर और संस्कृति के बीच की भूमिका में फिर से जान डाल कर दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के समग्र विकास की रूपरेखा तैयार करना है।
अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ (आईबीसी) ने शिलांग स्थित एशियाई संगम और त्रिपुरा स्थित धम्म दीप फाउंडेशन के साथ मिल कर इस सम्मेलन का आयोजन किया है। इसमें मंत्री, सांसद, आधायात्मिक संस्थाओं के प्रमुख, विद्वान, लेखक, नीति निर्माता, राजनयिक, उद्यमी और विभिन्न देशों से आए नागरिक संगठनों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं।
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने सम्मेलन का उद्घाटन किया।
आईबीसी के महासचिव लामा लोबजांग ने कहा, “सम्मेलन का मकसद धरोहर और सांस्कृतिक संबंधों के ताने-बाने पर विचार-विमर्श कर क्षेत्र के समग्र विकास की रणनीति बनानी है। भारत की ‘पूर्वोन्मुखी नीति’ ने पूर्वोत्तर के दक्षिण एशिया से संपर्क की राह तैयार कर दी है।”
नेपाल के संस्कृति, पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्री आनंद प्रसाद पोखरियाल ने कहा कि बौद्ध धरोहर परिपथ को दक्षिण एशिया और दक्षिणपूर्व एशिया के लोगों के बीच अच्छी समझ बनाने के लिए विकसित किया जा सकता है।
पोखरियाल ने संवाददाताओं से कहा, “नेपाल सरकार भगवान बुद्ध की विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा बनाने पर विचार कर रही है। देश में पहले से ही कई बौद्ध धरोहर इलाकों को विकसित किया जा चुका है।”
आईबीसी का मुख्यालय दिल्ली में है। इसकी स्थापना 2012 में हुई थी। इसमें 39 देश और 320 बौद्ध संगठन शामिल हैं।
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