भोपाल गैस हादसा : जिंदगी बचाने की जद्दोजहद में गर्भ भी गिर गए

भोपाल, 28 नवंबर (आईएएनएस)। मेमुन निशां (70) की आंखों में भोपाल गैस हादसे की दहशत को 32 वर्ष बाद अब भी आसानी से पढ़ा जा सकता है। वह उस रात को याद करके सहम जाती हैं, क्योंकि वह तब गर्भवती थी और जान बचाने की कोशिश में अजन्मे बच्चे को खो बैठी। मेमुन निशां अकेली महिला नहीं है, जिन्होंने अपने अजन्मे बच्चे को खोया है और भी कई ऐसी महिलाएं हैं, जिनके लंबे समय तक गर्भ नहीं ठहरा।

भोपाल, 28 नवंबर (आईएएनएस)। मेमुन निशां (70) की आंखों में भोपाल गैस हादसे की दहशत को 32 वर्ष बाद अब भी आसानी से पढ़ा जा सकता है। वह उस रात को याद करके सहम जाती हैं, क्योंकि वह तब गर्भवती थी और जान बचाने की कोशिश में अजन्मे बच्चे को खो बैठी। मेमुन निशां अकेली महिला नहीं है, जिन्होंने अपने अजन्मे बच्चे को खोया है और भी कई ऐसी महिलाएं हैं, जिनके लंबे समय तक गर्भ नहीं ठहरा।

मेमुन निशां अपने पति निसार अहमद और पांच बच्चों के साथ स्टेशन के करीब गरम गड्डे इलाके में रहा करती थी। दिसंबर 1984 में वह गर्भवती थी, दो-तीन दिसंबर 1984 की रात को वह अपने बच्चों के साथ सो रही थी, तभी उसे ऐसा लगा जैसे कहीं मिर्ची जल रही और उसकी आंखों में जलन होने लगी। इसी दौरान पता चला कि यूनियन कार्बाइड से गैस रिसी है। फिर तो जान बचाने के लिए अपने परिवार के साथ भाग खड़ी हुई।

वह उस रात के नजारे को याद कर बताती है कि उसके पति निसार अहमद उसे और बच्चों को लेकर कब्रिस्तान की ओर भागे, रास्ते में उन्होंने देखा कि जगह-जगह लोग बदहवास होकर भागे जा रहे हैं, कई लोग सड़कों पर बेहोश पड़े हैं, उन्हें बच्चों के साथ गढ्ढे में बैठा दिया गया, जिसके चलते उनकी जान बच गई। मगर इस हादसे में जान बचाने की जद्दोजहद में उसके गर्भ में पल रहा बच्चा जन्म लेने से पहले ही मर गया।

मेमुन निशां की बेटी जाहिदा नूर (38) बताती है कि उसके पिता चांदबड़ क्षेत्र में स्थित एक मिल में काम करते थे, वे गैस के असर के चलते बीमार रहने लगे और आगे चलकर उनकी मौत हो गई। वे पांच बहन-भाई भी गैस से मिली बीमारियों से अब तक जूझ रहे हैं।

गृह निर्माण मंडल द्वारा गैस पीड़ितों के लिए बनाई गई कॉलोनी में मौजूद महिलाओं ने बताया कि हादसे के समय जो महिलाएं गर्भवती थी, उनमें से अधिकांश के गर्भ गिर गए थे, कई महिलाएं तो ऐसी रहीं जिनका कई बार गर्भपात हुआ।

भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति की संयोजक साधना कार्णिक ने आईएएनएस को बताया, “हादसे के बाद एक समूह ने सर्वेक्षण किया था तब यह तथ्य सामने आए थे कि गैस हादसे के बाद गर्भपात की घटनाएं बेतहाशा बढ़ी। उस सर्वेक्षण में यह बात सामने आई थी कि गर्भपात की घटनाओं में सामान्य से तीन गुना इजाफा हुआ।”

ज्ञात हो कि यूनियन कार्बाइड संयंत्र से दो-तीन दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात रिसी मिथाइल आइसो सायनाइड (मिक) गैस ने तीन हजार से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुला दिया था। उसके अलावा लाखों लोगों को बीमारियों की जद में ला दिया। बीते 32 वर्षो में बीमारियों के चलते हजारों लोगों की मौत हो चुकी है, वहीं लाखों अब भी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं।

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