मप्र:जिला अस्पतालों के निजीकरण के खिलाफ नागरिक संगठनों ने खोला मोर्चा

भोपाल– मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार शासकीय जिला अस्पतालों का निजीकरण करने की तैयारी में है। सोमवार को कैबिनेट बैठक में निर्णय लिया गया की अस्पतालों को PPP मोड पर मेडिकल कॉलेज बनाया जाएगा और निजी कंपनियां इसका संचालन करेगी। शासकीय अस्पतालों के निजीकरण के विरुद्ध नागरिक संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राज कुमार सिन्हा ने कहा की सरकार का यह निर्णय जन स्वास्थ्य अधिकार की भावना के विपरीत है और इससे जरूरतमन्द जनता स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित होगी।

बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ ने बयान जारी कर सरकार के इस निर्णय की आलोचना की है। संघ ने कहा कि सरकार के इस निर्णय से गरीब वंचितों के इलाज का एक बड़ा संस्थान उनकी पहुँच से दूर हो जाएगा। हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था में जिला अस्पताल प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की दृष्टि से जिले में महत्वपूर्ण जरूरी स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करता है और जिले में केंद्रीय भूमिका में है। जिला अस्पताल पर सम्पूर्ण जिले की आबादी के स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी होती है, केवल अस्पताल में स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने वालों की नहीं। आज प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना पहली प्राथमिकता है।

संघ के नेता राजकुमार सिन्हा ने बताया कि ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2021-22 के अनुसार प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में 4134 उप स्वास्थ्य केंद्र, 1045 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 245 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रो की कमी है इसी प्रकार की कमी आदिवासी और शहरी क्षेत्रों में भी है। साथ ही इन स्वास्थ्य केन्द्रो में चिकित्सक और अन्य मेडिकल और पेरा मेडिकल स्टाफ की कमी भी है। सरकार का प्रयास प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने वाले संस्थानो को मजबूत करने और कमियों को दूर करने पर होना चाहिए।

सिन्हा ने आगे कहा की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 स्वास्थ्य देखभाल के लिए अधिकार-आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता का समर्थन करती है और बेहतर व्यवस्था के लिए वित्तीय और ढांचागत संसाधनों का एक निश्चित स्तर होना चाहिए। जहां सबसे गरीब आबादी लाभान्वित हो सके और कानूनी मुद्दों से बच सके। स्वास्थ्य नीति एक सक्षम वातावरण स्थापित करने के लिए गारंटीकृत फंडिंग के साथ क्रमिक और वृद्धिशील दृष्टिकोण की सिफारिश भी करता है कि भविष्य में स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच एक मौलिक अधिकार बन जाए।

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