नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। इन दिनों ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ पर बहुत चर्चा हो रही है, जबकि रामानुज ऐसे संत थे, जिन्होंने एक हजार साल पहले ही ‘लाइन ऑफ कंट्रोल क्रॉस’ करने का साहस दिखाया था। यह बात वृंदावन स्थित राधारमण मंदिर के पुजारी श्रीवत्स गोस्वामी ने इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित एक संगोष्ठी में कही।
केंद्र की ओर से आयोजित ‘संस्कृति संवाद श्रृंखला-2’ के तहत ‘रामानुजीयम.रामानुज का संसार’ शीर्षक वाली विचार संगोष्ठी में कहा, “इन दिनों ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ पर बहुत चर्चा हो रही है, जबकि रामानुज ऐसे संत थे, जिन्होंने एक हजार साल पहले ही ‘लाइन ऑफ कंट्रोल क्रॉस’ करने का साहस दिखाया था।”
गोस्वामी ने इस संदर्भ में कहा कि रामानुज का संस्कृत छोड़कर अपने तर्क और विचारों को आगे बढ़ाने के लिए तमिल को अपनाना नियंत्रण रेखा का उल्लंघन जैसा ही था।
उन्होंने समसामयिक काल में संत रामानुज के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, “आज से एक हजार साल पहले उनकी वजह से देश के सामाजिक, धार्मिक और बौद्धिक जीवन में गुणात्मक परिवर्तन आया। वह भक्ति को दार्शनिक विमर्श के केंद्र में लेकर आए।”
गोस्वामी ने इस संदर्भ में चैतन्य महाप्रभु का भी उल्लेख किया, जिन्होंने संस्कृत की जगह उड़िया, बृज भाषा और बंगाली को अपनाया।
धर्म में भक्ति-मार्ग का उदय द्रविड़ देश (दक्षिण भारत) में हुआ और संत रामानुज इसे उत्तर भारत में लेकर आए। आंदोलन ने भारतीयों का मनोबल ऐसे समय ऊंचा बनाए रखा, जब समाज अनेक धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियों से जूझ रहा था। समाज में तार्किकता, आत्मविश्वास और आत्मगौरव की भावना का संचार करने में उनका विलक्षण योगदान रहा।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य-सचिव सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि रामानुज का काल सांस्कृतिक और बौद्धिक दृष्टि से भारत का स्वर्णकाल था। जैन, बौद्ध, स्मार्त, शैव आदि अनेक धर्मो को मानने वालों के बीच असहमति होते हुए भी संवाद का अच्छा माहौल था। उनका इशारा आज हर क्षेत्र में हो रहे कटुतापूर्ण वाद-विवाद की ओर था।
यह वर्ष संत रामानुज का सहस्राब्दी वर्ष है। संगोष्ठी में रामानुज के धार्मिक, सामाजिक, बौद्धिक व दार्शनिक योगदान पर चर्चा हुई।
उन्होंने कहा, “रामानुज ने भक्ति आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए संगीत, नृत्य, रंगमंच, पेंटिंग आदि को भी अपनाया। इससे वह राष्ट्रीय और सामाजिक एकीकरण में बहुत सफल रहे। भक्ति आंदोलन के जरिए उन्होंने धर्म पर पड़े ज्ञान और कर्म के दंभ को खत्म कर दिया। भारतीय दर्शन में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, चार पुरुषार्थ गिनाए गए हैं, लेकिन उन्होंने ‘प्रेम भक्ति’ के रूप में पंचम पुरुषार्थ को प्रस्थापित किया।”
उन्होंने कहा कि धर्म में भक्ति-मार्ग का उदय द्रविड़ देश (दक्षिण भारत) में हुआ, लेकिन उसने उत्तर भारत में नई ऊर्जा पाई। वृंदावन ने तो भक्ति आंदोलन को नया स्वरूप ही दे दिया।
राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर कौशलेंद्र दास ने कहा कि रामानुज ने भक्ति की पद्धति को तर्को से परिशुद्ध किया। दक्षिण से शुरू कर भक्ति की गंगा को राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पूरे भारत में प्रवाहित किया।
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