नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बुधवार रात पाकिस्तानी नाट्य मंडली ने ‘कौन है ये गुस्ताख’ नाटक का मंचन किया। इसके मंचन ने शहर के थिएटर प्रेमियों के लिए दिलों में कुछ कड़वी यादें फिर से ताजा कर दीं।
नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बुधवार रात पाकिस्तानी नाट्य मंडली ने ‘कौन है ये गुस्ताख’ नाटक का मंचन किया। इसके मंचन ने शहर के थिएटर प्रेमियों के लिए दिलों में कुछ कड़वी यादें फिर से ताजा कर दीं।
उल्लेखनीय है कि उर्दू के मशहूर लेखक सादत हसन मंटो पर आधारित ‘कौन है ये गुस्ताख’ नाटक के मंचन को दो साल पहले भारत-पाक सीमा पर तनाव बढ़ने की वजह से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) ने रद्द कर दिया था। इस नाटक को एनएसडी के भारत रंग महोत्सव में हिस्सा लेना था।
नाटक के निर्देशक शाहिद नदीम को इस बात की खुशी है कि इस बार इसका मंचन बड़े पैमाने पर हुआ है। नदीम ने आईएएनएस को बताया, “पूरा प्रकरण भावनात्मक था। हालांकि पिछली दफा अक्षरा थिएटर ने इसके रद्द होने के बाद हमें इसके मंचन का एक मौका दिया था। हमें खुशी है कि इस बार इसका मंचन अधिक बड़े सभागार में हुआ है।”
‘कौन है ये गुस्ताख’ 1949 में मंटो के पाकिस्तान चले जाने के बाद के उनके जीवन, उनके काम और घटनाओं पर केंद्रित है। यह नाटक चल रहे चार दिवसीय पाकिस्तानी रंगमंच उत्सव ‘हमसाया’ का हिस्सा है, जिसका आयोजन गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) रूट्स 2 रूट्स के सौजन्य से अजोका (पाकिस्तानी नाट्य मंडली) ने किया है।
नदीम ने कहा कि नाटकों से दारा सिकोह, मंटो और बुल्ले शाह जैसे नायकों को पुन: सामने लाया गया है। नाटक इन नायकों के शांति संदेश और सामाजिक प्रासंगिकता के लिए चुने गए हैं। उन्होंने कहा कि भारत-पाकिस्तान के बीच की कड़वाहट को दूर करने में राजनीतिक चर्चाओं की बजाय सांस्कृतिक आदान-प्रदान मदद करेगा।
नदीम ने कहा, “चारों नाटक शांति और सौहार्द का संदेश देते हैं। मैं आशा करता हूं कि यह उप-महाद्वीप में अविश्वास और दुश्मनी के माहौल को दूर करने में मदद करेंगे। सांस्कृतिक आदान-प्रदान राजनीतिक बहस में पड़े बिना पूर्वाग्रहों के पर कतर सकता है।”
अगर दर्शकों ने उग्रवाद, सेंसरशिप और अपने आंतरिक संघर्ष के खिलाफ मंटों के संघर्ष को सराहा है, तो सूफी कवि और मानवतावादी बुल्ले शाह के जीवन पर आधारित नाटक ‘बुल्ला’ को भी जबर्दस्त प्रतिक्रिया दी।
नदीम को लगता है कि बुल्ले शाह का शांति संदेश भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए संगत है। उन्होंने कहा, “यहां नाटक को अच्छी प्रतिक्रिया मिली, क्योंकि बुल्ले शाह क्षेत्र के लिए प्रासंगिक हैं। उन्होंने अन्याय एवं पाखंड का विरोध किया और धार्मिक कट्टरपंथियों को चुनौती दी।”
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