शिमला, 3 जनवरी (आईएएनएस)। हैदाराबाद के एक इंजीनियरिंग कॉलेज के 24 विद्यार्थियों की डूबने से हुई मौत के मामले में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने छात्रों के अभिभावकों की व्यथा की आवाज में आवाज मिलाकर कानून के मानवीय पक्ष को उजागर किया है।
बीते 18 महीनों में न्यायालय ने शायद ही कोई मौका ऐसा छोड़ा हो, जब इस हादसे और ऐसे हादसे अब न हों, इस मामले में सरकार के रवैये पर उसे फटकार न लगाई हो।
उच्च न्यायालय ने शनिवार को दिए 111 पृष्ठों के फैसले में विद्यार्थियों की मौत को स्तब्धकारी और सभी को हिला कर रख देने वाला बताया है। न्यायालय ने सभी 24 मृतकों के घरवालों को 20-20 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने का आदेश यह कहते हुए दिया है कि इससे उनकी तकलीफ तो कम नहीं होगी लेकिन इससे एक सांत्वना मिल सकती है।
हैदराबाद के वी.एन.आर. विग्नना ज्योति इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के 24 विद्यार्थी और टूर आपरेटर आठ जून, 2014 को हिमाचल के मंडी में पानी में बह गए थे। मंडी के पास ही स्थित 126 मेगावाट के लारजी जलविद्युत परियोजना के बांध से बिना पूर्व चेतावनी के पानी छोड़ दिया गया था। विद्यार्थी मनाली घूमने आए थे।
हिमाचल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मंसूर अहमद मीर और न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान की पीठ ने कहा, “दुर्भाग्य से इनका (छात्रों का) सुनहरा भविष्य छीन लिया गया। अभिभावकों को वृद्धावस्था में इनसे मिलने वाली आय, आशा और मदद से वंचित कर दिया गया।”
अदालत ने इस हादसे के लिए राज्य की बेरुखी को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि यह राज्य का कर्तव्य है कि वह परियोजनाओं के कामकाज की निगरानी करे।
न्यायालय ने फैसले में कहा, “उपेक्षा और लापरवाही की तो बात ही छोड़िए, उन्होंने तो (सरकारी अधिकारियों ने) पहले से तयशुदा एहतियात भी नहीं बरती। अगर अधिकारियों ने बोर्ड लगाए होते, होर्डिग लगाई होती, सायरन, सिग्नल दिया होता, बांध से पानी छोड़ते समय समुचित समय के बारे में एहतियात बरती होती, तो इस घटना से बचा जा सकता था और बेशकीमती जानें बच सकती थीं।”
न्यायालय ने अपने फैसले में इंजीनियरिंग कॉलेज की भी आलोचना की है। न्यायालय ने कहा, “उन्हें (कॉलेज प्रबंधन को) सभी तथ्यों को जांच लेना चाहिए था। इसमें यह भी शामिल है कि जहां घूमने जाने की योजना बनाई जा रही है वहां की स्थितियां और अन्य तमाम बातें क्या और कैसी हैं।”
न्यायालय ने इस हादसे से जुड़ी एक मीडिया रपट को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर इस पर सुनवाई की थी।
न्यायालय ने कहा है कि हिमाचल प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड लिमिटेड, कॉलेज और हिमाचल सरकार को मुआवजे में क्रमश: 60, 30 और 10 फीसदी हिस्सा देना होगा। भुगतान आठ हफ्ते के अंदर करना होगा।
न्यायालय ने इससे पहले पांच लाख रुपये अंतरिम राहत की व्यवस्था की थी। इस राशि को मुआवजे में समायोजित किया जाएगा।
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