समान नागरिक संहिता से फर्क नहीं पड़ेगा : महिला जमात संस्थापक

नई दिल्ली, 24 मार्च (आईएएनएस)। महिलाओं की जमात की संस्थापक शरीफा खानम का कहना है कि समान सिविल संहिता मुसलमान महिलाओं के लिए बहुत मददगार नहीं होगी क्योंकि इनमें से अधिकांश इस संहिता के उल्लंघन के बाद भी अदालत का रुख नहीं करेंगी।

नई दिल्ली, 24 मार्च (आईएएनएस)। महिलाओं की जमात की संस्थापक शरीफा खानम का कहना है कि समान सिविल संहिता मुसलमान महिलाओं के लिए बहुत मददगार नहीं होगी क्योंकि इनमें से अधिकांश इस संहिता के उल्लंघन के बाद भी अदालत का रुख नहीं करेंगी।

तमिलनाडु में महिलाओं की जमात शुरू करने वाली खानम का मानना है कि मुस्लिम महिलाएं भारत में संवैधानिक और इस्लामी अधिकारों से वंचित हैं। इसके बावजूद समान नागरिक संहिता से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

खानम ने कहा, “समान नागरिक संहिता को लागू करना ठीक है लेकिन 90 फीसदी महिलाएं अदालत जाएंगी ही नहीं। मुद्दे परिवार में ही सुलटा लिए जाएंगे, इससे आगे नहीं जाने पाएंगे।”

यहां शुक्रवार को इंडिया टुडे महिला सम्मेलन में ‘राइट टू प्रे: आर वोमेन चिल्ड्रेन आफ अ लेसर गॉड’ विषय पर हुए सत्र में खानम ने यह बातें कहीं।

उन्होंने कहा, “जब हमने महिलाओं के लिए मस्जिद बनाने की कोशिश की तो जिस चीज ने हमें, हमारी महिला कामगारों को रोकने की कोशिश की, वह था चरित्र हनन और शारीरिक प्रताड़ना।”

खानम ने कहा कि बीते 20 सालों में 100 से अधिक लड़कियों को खुदकुशी का नाम देकर मार डाला गया है।

उन्होंने कहा, “मैं इन तमाम सालों से मुस्लिम महिलाओं के लिए काम कर रही हूं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हमारा समर्थन नहीं किया। मुस्लिम महिलाएं बिना किसी वजह के तलाक पा रही हैं। कुरान यह नहीं कहता, पर्सनल लॉ यह नहीं कहता।”

खानम ने बताया, “जब मैं 15 साल की थी तो मुझे घर के बाहर खड़े नहीं होने दिया जाता था। मेरा अपना भाई मुझे धर्म और ईश्वर को नहीं मानने की बात कहते हुए पीटता था। लेकिन, मुझे इस सब की परवाह नहीं थी।”

खानम ने बताया, “मुझे मेरे आसपास के लोगों ने चरित्रहीन और धर्मविरोधी करार दिया। मुझे महसूस हुआ कि हम महिलाओं के साथ धर्म के नाम पर भेदभाव किया जाता है। हमें मुस्लिम महिलाओं के लिए मौकों और शक्ति की जरूरत है।”

मानवाधिकार कार्यकर्ता तृप्ति देसाई भी सत्र में शामिल हुईं। मंदिरों और दरगाह में महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को इन्होंने जोरशोर से उठाया है।

तृप्ति ने कहा, “1950 में, महिलाओं को भारतीय संविधान ने समान अधिकार दिए। लेकिन, हकीकत में इस पर अमल नहीं हुआ। हम बहुत ही सहज सा सवाल उठा रहे हैं कि जब सभी पुरुषों और महिलाओं की जननी महिला ही है तो फिर वह अपवित्र कैसे हो सकती है।”

उन्होंने कहा, “जब मैंने शनि शिंगणापुर मंदिर में दूसरी बार प्रवेश का प्रयास किया, तो लोगों ने कहा कि इसका तलाक होने वाला है और इसे घर से बाहर फेंक दिया जाएगा। हमें ब्लैकमेल किया गया। पुलिस ने हमें पकड़ा, लेकिन हमें कुछ भी रोक नहीं सका।”

तृप्ति से पूछा गया कि वह अपने सात साल के बेटे को हालात के बारे में कैसे समझाती हैं। उन्होंने कहा, “मुझे कभी भी उसे सफाई देने की जरूरत नहीं पड़ी। उसने टीवी पर देखा कि पुलिस मुझे पीट रही है। उसने मुझसे कहा कि घर मत लौटो, वहीं रहकर उन महिलाओं की हिफाजत करो।”

उन्होंने कहा कि यह छोटा बच्चा बड़ों से बेहतर बातों को समझता है। वह कहता है, “मेरे साथ मेरे क्लास में लड़कियां हैं। वे तो हर जगह हैं। फिर, भला वह धर्मस्थलों में क्यों नहीं प्रवेश कर सकतीं?”

तृप्ति ने कहा, “सभी धर्मस्थलों में समानता होनी चाहिए। अगर सरकार ऐसे नियम बना दे तो फिर सबके लिए अच्छे दिन आ सकते हैं।”

खानम और तृप्ति, दोनों ने बाबरी मस्जिद मुद्दे को सुलझाने के सुझाव दिए।

तृप्ति ने कहा, “वो चाहे जो बनाएं..मंदिर, मस्जिद, दरगाह..महिलाओं को पुरुषों के हाथ में हाथ डालकर इसमें प्रवेश की इजाजत होनी चाहिए।”

खानम ने कहा, “मैं बाबरी मस्जिद के बजाए शिक्षा का केंद्र बनाना पसंद करूंगी क्योंकि शिक्षा हर धर्म के लिए बहुत जरूरी है।”

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